जन्माष्टमी
लघुकथा
डॉ मंजु गुप्ता, वाशी , नवी मुंबई
"नानी, आज जन्माष्टमी है। मैं आपके हाथ का फलाहार खाने, कान्हा को सजाने आ रही हूँ।" धेवती ने फोन काटा।
"आ जा। सीखा भी दूँगी।"
"यूट्यूब पर एक रेसिपी खोलो तो दस आ जाती हैं, समझ ही नहीं आता कौन सी सही है।"
"तेरी मम्मी हिमानी तो डॉक्टर है, उसे फुरसत ही कहाँ।"
"मम्मी तो ऑनलाइन ऑर्डर कर देती है, हमें उसका स्वाद अच्छा नहीं लगता।"
नानी हँसी, "ऑनलाइन से पेट भरेगा, मन नहीं।"
"हा , घर में तो ढेर सारी बन जाती है।"
"सही , सात तरह की पंजीरी बनती हैं।"
"अच्छा !"
"कुट्टू की पूरी, धनिया की पंजीरी, गोंद, मींगी , मखाने की प्रसादी , पोस्त की ... ये सब तेरी मम्मी हिमानी को मैंने ही सिखाई थी।"
हाँ , आपका फलाहार मेरे दादा-दादी को बहुत पसंद आता है ।"
"उनका भी बना दूँगी।"
"वो तो दादी आज भी आपकी तारीफ करती हैं।" फोन काटा।
घंटी बजी। धेवती आँगन में थी।
"हिमानी नहीं आई?"
"माँ ड्यूटी पर है।"
"अच्छा।"
" लो , फूल माला और फूल सजाने के लिये।"
"हाँ ,
शाम से कॉलोनी के पार्क में कान्हा का जन्मोत्सव पर्व मना रहे हैं । वहाँ पर ब्रज के कालाकार रासलीला करेंगे।"
"अरे , वाह प्रभु कृष्ण जी की वर्षगाँठ ....।"
नानी ने थाली सजाई, "चल, आज तू ही कान्हा का श्रृंगार कर।"
धेवती ने मुकुट पहनाते हुए कहा, "नानी,ऑनलाइन ऑर्डर से थाली सजती है । जन्माष्टमी नहीं..।"
"सटीक कहे। नानी ने धेवती , अन्य के संग प्रभु को कैमरे में कैद किया।"
" रेसिपी पर हाथों की प्यार की ऊष्मा का स्वाद और मन का प्रेम भाव तो यहीं मिलता है।"
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