Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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होश की ज्वाला

 

होश की ज्वाला


मृगतृष्णा के इस मरुस्थल में, जो तुम्हें निमंत्रित करती है,

तरल छांव की आड़ पहनकर, जो भीतर तक छलती है,

वह न तो प्याला, न मधुशाला, केवल एक छलावा है,

जिसकी पहली ही घूंटों में जीवन की ज्योत पिघलती है।

तुम जिसको समझे जीवन-रस वह तो सांसों की ढलान

होश गंवा कर जीवन जीना

जीने का अपमान

क्षण भर की इस झूठी उड़ान में आसमां तुम्हारा लगता है,

पर पंख कुतरती हुई हवा का

असली खेल न दिखता है,

जो धुआँ फेफड़ों में भर कर, कहते हो बेफ़िक्र हैं हम,

उस धुएं के हर एक छल्ले में, चेतना का शव जलता है।

तुम जिसको समझे आज़ादी वह अदृश्य जंजीर-समान

होश गंवा कर जीवन जीना जीने का अपमान

माना रास्तों में कंकड़ हैं, माना मन में कुछ पीर भी है,

पर उस पीर को पी जाने में, ही तो असली तासीर भी है

जहर को पीकर शिव बनना इस जीवन का शाश्वत सच

कायर बनकर सो जाने में

कैसी भला तक़दीर भी है?

दर्द से भाग के खो जाने में, कैसा वीर-जवान

होश गंवा कर जीवन जीना

जीने का अपमान

यह प्याला तो एक ठगी है, जो तुमको तुमसे छीन रही,

तेज तुम्हारे चेहरे का यह, चुपके-चुपके बीन रही,

तुम सृजनहार हो इस जग के

तुम नए युग के वाहक हो,

पर इस विष के गहरे जल में

नौका तुम्हारी लीन रही।

क्या इसीलिए था मिला तुम्हें, यह असीम ज्ञान का वरदान?

होश गंवा कर जीवन जीना, जीने का अपमान!

छोड़ो यह सन्नाटे का मद, छोड़ो यह झूठी रंगीनी,

असली नशा तो लक्ष्य-प्राप्ति का, जिसकी रंगत सबसे भीनी,

रक्त में जब संकल्प बहेगा, जब संघर्ष का सुर जागेगा,

तब इस जग के हर एक सिखर पर, फहरेगी तेरी ही झीनी।

उठो! सम्हालो निज चेतना, तुम हो इस युग का स्वाभिमान

होश गंवा कर जीवन जीना, जीने का अपमान

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