Swargvibha
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हिमालय पर खतरा मंडराया

 

कुकुभ छंद में   हिमालय पर खतरा मंडराया 


शैल हिमालय की चोटी पर , आज विकट संकट छाया।

मिट्टी के पुतले मानव ने , गंद प्रदूषण बरसाया।।

  भूला पर्यावरणीय नियम, भू-नभ का ताप बढ़ाया।।

बदला मौसम का मिजाज है,सूखा बाढ़ कहर लाया।।


हुआ मनुज की नासमझी पर, सुराख ओजोन अहाते ।

सातों सागर नदियों में  हैं, कचरा गंद को बहाते।।

ऊँचे-ऊँचे धवल शिखर पर, देखो अब कालिख  छाई ।

सुंदर सुरम्य शांत धरा पर, संकट की फिर ऋतु आई ।


प्लास्टिक का ढेर लगा के,बीमारी नित्य बुलाते ।

जहरीली गैसें कार्बन से, धरती का ताप बढ़ाते।।

सैलानी आते जाते हैं, कचरा यहाँ गिराते।

पर्वत के पावन अंचल को,  पल-पल मलिन बनाते।।


पिघल रहे हैं ग्लेशियर सभी,नदियाँ सिंधु जल बढ़ाती।

बन के प्राकृतिक आपदा , बाढ़ सुनामी दुख लाती।।

धुआँ वाहनों फैक्ट्री का जो,  वायु प्रदूषण जग लाता 

  हवा मुनस्यारी की पावन ,  उनमें अब जहर समाता ।


बादल भी अब भारी धातु, लेकर रोज बरसते हैं।

निर्मल जल पाने को देखो, सब जन  जीव तरसते हैं।

वन जंगल में आग सुलगती,वायु जीव को झुलसाती ।

प्रकृति की सुंदर बगिया को,ये पल में राख बनाती।


जागो रे मानव तुम जागो, अब अपना फर्ज निभाओ ।

इस पावन देवधरा को अब,  मिलजुल कर शीघ्र बचाओ।। 

वृक्ष लगाओ कूड़ा रोको, स्वच्छता का दीप जलाओ।

 करो हिमालय की रक्षा, जगजीवन सुखद बनाओ।।


जगत चेतना  से मिलकर ही , ऐसा परिवर्तन लाना।हरियाली का  विस्तार करो, आज कल को है बचाना।।

न फटेगें घाटी में बादल , आएगी ना बाढ़  तबाही।

 होए न भूस्खलन का खतरा, न मरेगें पथ में राही।।


डॉ मंजु गुप्ता

वाशी , नवी मुंबई।

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