गंगा सुता गंगोदक/गंगाधर/लक्षी/खंजन सवैया*
डॉ मंजु गुप्ता
मात भागीरथी उत्तराखंड की गोद शैलेन्द्र से जन्म लेके बहे।
गाय का चेहरा - सा लगे जन्म पै रूप गंगा सुता का सभी हैं कहे।।
पर्वतों से कुलाँचें लगा बालिका राह में भक्त - पापी सभी को सहे।
धीर गंभीर तारुण्य श्री वक्ष का चंचला वेग के शोर से थे ढहे।।
सभ्यता पोषिता देश की तू सदा, भेद पानी नहीं है कभी भी करे ।
शाप से घास के पुत्र थे भूप के , प्राण तूने उन्हीं के किये थे हरे।।
जिंदगी दे सँवारे सहारा बनी , सींचती घाटियाँ लोक को है तरे।
मोक्ष दे के करे भक्त उद्धार है , रूप तेरे कई नाम तेरे धरे।।
भा गयी भक्त को है छटा गंग की मोहिनी नाद में गीत में लावनी ।
गंग में गंद डालें सभी लोग हैं हो रही गंदगी सूखती सावनी।।
कांति श्रीहीन हो पाट मैले हुए बाँध से जीर्ण काया लगे पावनी ।
मातु में गंद को फेंकना है नहीं जिंदगी चेतना प्राण की बावनी।।
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