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गंगा का तीरथ मिला

 

कुंडलिनी  में मेरा परिचय और राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद से मिलन 

डॉ मंजु गुप्ता



गंगा का तीरथ  मिला , जन्मभूमि आध्यात्म।


जन्म लिया ऋषिकेश में , कुदरत का  वह धाम ।


कुदरत का वह  धाम, बड़ा ही सुंदर चंगा।


' मंजु 'कहे है सत्य , बहे है पावन गंगा।। 


 माता मेरी शांति थी , प्रेमपाल  पितु नाम ।


 'मंजु' मुझे  सब बोलते , करती उन्हें प्रणाम।।


करती उन्हें प्रणाम, बने गुरु विद्या दाता।


बलिहारी हूँ तात , मिली  है प्यारी  माता।।


अंतर लैंगिक  था  नहीं, मिलता  मान समान।


 क्रांति करी शैक्षणिक थी , साक्षर किया जहान।।


साक्षर किया जहान,दिया विद्या  का  मंतर।


दलितों को दी छाँव, नहीं था कोई  अंतर ।।


 शैशव में  थे राष्ट्रपति ,  आए जब ऋषिकेश ।


  मुलाकात में है मुझे, दिखा सरल था वेश।।


  दिखा सरल था वेश , सौम्यता का था वैभव ।


 आकर्षक  व्यक्तित्व, देख के झूमा शैशव ।।


 मिला राष्ट्रपति का मुझे, भर -भर आशीर्वाद।


हुयी सफल मन  कामना ,  लेखन मिला प्रसाद।।


 लेखन मिला प्रसाद, तभी शैशव सर्व हिला।


 छोड़ दिया तब खेल, कलम का उपहार मिला।।


 रच के  तेरह कृति सभी , मिले प्रणित प्रतिमान  ।


कवयित्री लेखक  बनी, कलम बनी जग शान।।


कलम बनी जग शान , विश्व का है लिखती सच ।


बना  योग गुरु देश , कीर्ति का फिर वैभव  रच  ।।


 सकल सृष्टि का रो रहा , आज सखी है प्यार ।


 प्रकृति पेड़ ऋतु सब विकल, बहे  अश्क़  की  धार ।।


बहे अश्क़   की धार  , विदाई का आया  पल ।


 चली सुता घर छोड़  , निभाने पति धर्म सकल।।


 गंगा  यह ऋषिकेश की , पहुँची सागर पास ।


साजन  स्वतंत्र  हैं मिले , लगी  मुम्बई रास ।।


लगी  मुम्बई रास , सजन से दिल है रंगा।


मंजु सत्य है बात , मिले सागर में गंगा।।


 प्यारी लगती मुम्बई, मिली मुझे पहचान।


महक कलम से है रहा, जग में हिंदुस्तान ।।


जग में हिंदुस्तान, यहाँ की संस्कृति न्यारी ।


सनातन है आधार  ,वेद  वाणी जग प्यारी  ।।

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