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दुर्मिल सवैया यादों में बचपन

 

दुर्मिल सवैया यादों में बचपन



डॉ मंजु गुप्ता



रचते सजते घर द्वार सभी सजनी घर में खुशियाँ भरती।


सुघड़ी शुभ ढोलक  गीत गवे बिटिया अखियाँ  वर को वरती।।


वरमाल लिये अनुराग खड़ी प्रिय डालत माल घड़ी  हरती।


रघुनंदन संग विदा करके  दृग नीर बहे बहना  बरती।।




बसते  नित भ्रात  सभी मन में उनकी मधु याद सदा रहती।


मृदु शैशव में उनकी नित छाँव मिली लख शीतल वायु वहाँ बहती।।


करती तब वीरन कुंकुम भाल लगा अब दूर  हुआ दुख मैं सहती।


 जननी बन जन्म दिया हमको जुड़ नाल जुड़ाव कथा कहतीं।।    




घर  द्वार सजे नव पर्व सजा लगता नित भ्रात सुहावन है।


फिर भी अब जीवन बंधन साजन संग लगे  मनभावन है।।


उमड़ी-घुमड़ी  मन पीर यहाँ बदरी बरसे सुख सावन है।


रचती अनुभूति कथा-कविता सब में इक प्यार सुपावन है।।






गहने  पहने  करती तुझको  नित याद यहाँ  यह जो  बहना।


उपहार दिया अनमोल मुझे पहुँची पति  धाम जहाँ रहना।।


सपना मुझको लगता न सही गम-हर्ष  यहाँ अब  है सहना।


सच प्रेम करे  बहना तुम से खुद ढाल बनी यह है कहना।। 

 


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