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दोहों में बेटी

 

दोहों में बेटी

डॉ मंजु गुप्ता


अब की बार बहार  में , आया खूब निखार। 

 सुता  जन्म के हर्ष से , महक गया संसार।।


बिटिया ऐसी लाडली  , जैसे महक गुलाब।  

उसकी   छवियाँ देख के , झूमें मन के ख्वाब।।


वह गुड़िया ओ पालना , बचपन की मुस्कान। 

खेलों   के संसार  में ,  रंगी   नन्हीं जान।।


मात - सुता  को देख कर,  हर जन करता नाज।

होती  माँ का रूप है ,इक  दुजे का साज।।


नहीं भ्रूण मसले मनुज  , नन्हीं कोई  लाज  

 रूठे  इनसे नर नहीं   ,   करो सुता पर नाज।।


मैका महकाती  सदा , महकाए ससुराल।

प्रीत  - रीत से चले, रिश्ता सालों  साल।।


पुत्री  अब सुत सम बनी,   जीवन भर दे  साथ ।  

 सुख - दुख की लाठी बनी, फर्ज निभाए हाथ।।


सारे जग के सुख मिले , खुशियाँ मिलें अपार।

 बन सुहाग की लालिमा, सारे दुख हो पार।।

मित्रता है ना के बराबर

  -अँजनी कुमार पाठक


मित्रता है ना के बराबर इन्सानियत ना रहा

स्वार्थ के वशीभूत हैं सब प्रेम भाव ना रहा

खून के प्यासे बने हैं धोखाधड़ी भी बढ गई

कृष्ण-सुदामा की मित्रता इस जग मेँ ना रहा

जातिवाद भेदभाव इन्सानियत के दुश्मन बने हैं

मुश्किलों मेँ साथ देनेवाला इस धरा पर कम रहा

समानता अधिकार है सँविधान है कह रहा

राजनीति हो रही कलँकित कोई सगा ना रहा

आग महल मेँ लगी थी देखा सब बुझाते रहे

महलवालोँ की मित्रता ऐसे लोगों से ना रहा

काम आते हैं पडोसी मित्रता करके देखिये

रिश्ते -नाते दूर के वक्त पर ना खडा रहा

मित्रता सबसे रखें दुख -सुख के भागी भी बने

इन्सानियत मजहब हमारा कहने भर को है रहा।

 


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