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दोहों में प्राणनाथ पति श्री

 

दोहों में प्राणनाथ पति श्री


हास्य रस

डॉ मंजु गुप्ता


लंबू मेरे पति बड़े , लगते  डंडामार।


हकला के है बोलते , सबसे बीच बजार।




जाली पति की  आँख हैं, प्याले जैसी नाक।


कहूँ उन्हें हीरो सदा , लगे आम की फाँक।।




भावी मेरी गाय है , करती सारा काम।


उफ तक करती है नहीं , जपे सास का नाम।।




भोले मेरे पति बड़े , लगते कालीदास।


बिना नमक खाना लगे , छप्पन भोग मिठास।।


 लालकिला है देखना, कहती अपने नाथ।



चालबाज हैं पति बड़े , चित्र बनाए हाथ ।।


 उछले ऐसे पति सदा ,  कुकर सिटी  है मार।



नन्दी के आते तभी, पकती दाल बहार।।


  ले विवाह फेरे वचन , आँख दिखाए चार।



मैं - मैं बकरी बोलती , ऐसी यह सरकार।।


 है विवाह बंधन सदा , गाँठों की भरमार।



 करे बहू  तू बात है , गोल चक्करदार।।


 वर विवाह पर आय जब, सेवर करने द्वार।



खींचे उसकी नाक है , वरनी थानेदार।।


 वर विवाह पर है करे ,   नाटक ढ़ोंग हजार।



साडू को तुम  घास भी , डालो अब सरकार।।


 माँ विवाह से पूर्व जो , जैसे करते काम ।



वैसे करना आप सब , मैं पीऊँगी जाम।।


  है विवाह की रस्म यह  , बोले वर जब छंद।


मारे ताना सास को , साली मुझे पसंद।।



 वर विवाह कर  जब  वधू , दोनों थे कविराज।



प्रथम रात कविता चली  , भूल प्रेम   सरताज।।


 वो विवाह के पूर्व ही , लगती फूल गुलाब ।



लगे बाद में वधु बुरी , जैसे फ़टी किताब।।


 है विवाह वर रस्म जो ,  साली जूता  चोर।



मांगे साली नेग जब ,   चित्र  दिखा वर मोर।।

 


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