Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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दोहे में पिता को पाती

 

दोहे में पिता को पाती


छोड़ गए  हमको पिता ,    इस नश्वर संसार ।

लिखूँ आपको पत्र मैं , भरा याद में प्यार।।


उपकारों के  तात का ,नहीं और औ छोर।

पिता - सुता के बीच - सा,कहीं न मिलती डोर।।


 खिला -खिला कर  गोद में ,  करते हमको  प्यार ।

  पूरी ख्वाहिश  कर सभी , करते खूब  दुलार ।।


बनकर घोड़ा  खेलते , बच्चों से  हर हाल। 

भर के  गागर प्रेम  की , बचपन करें निहाल।।


पालक  जीवनक्रम के    , करते सारे काम ।


 पग चलना  सीखा प्रथम    ,पिता - अँगुलियों थाम।।


  नहीं ककहरा याद जब  , रटवायें हर बार ।


  जीवन - गुरु बनकर सदा    , देते सीख हजार।।


गीता , वेद पुराण सम  , देय   गूढ़ नित ज्ञान ।


ठोस बनाया ' आज' को  ,  फिर भावी सौपान ।।


 भरी  पिता  की बात में,    मधु सम  मधुर मिठास।

  प्रेम - कलश   रीते नहीँ ,भरें  खुशी ' औ ' हास।। 


 हमें बनाया योग्य  है, खूब किया जग काम।


 होते पितु खुश आज तुम , सुनकर मेरा नाम।।

डॉमंजु गुप्ता , वाशी , नवी मुंबई।


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