दोहे में पिता को पाती
छोड़ गए हमको पिता , इस नश्वर संसार ।
लिखूँ आपको पत्र मैं , भरा याद में प्यार।।
उपकारों के तात का ,नहीं और औ छोर।
पिता - सुता के बीच - सा,कहीं न मिलती डोर।।
खिला -खिला कर गोद में , करते हमको प्यार ।
पूरी ख्वाहिश कर सभी , करते खूब दुलार ।।
बनकर घोड़ा खेलते , बच्चों से हर हाल।
भर के गागर प्रेम की , बचपन करें निहाल।।
पालक जीवनक्रम के , करते सारे काम ।
पग चलना सीखा प्रथम ,पिता - अँगुलियों थाम।।
नहीं ककहरा याद जब , रटवायें हर बार ।
जीवन - गुरु बनकर सदा , देते सीख हजार।।
गीता , वेद पुराण सम , देय गूढ़ नित ज्ञान ।
ठोस बनाया ' आज' को , फिर भावी सौपान ।।
भरी पिता की बात में, मधु सम मधुर मिठास।
प्रेम - कलश रीते नहीँ ,भरें खुशी ' औ ' हास।।
हमें बनाया योग्य है, खूब किया जग काम।
होते पितु खुश आज तुम , सुनकर मेरा नाम।।
डॉमंजु गुप्ता , वाशी , नवी मुंबई।
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