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अंबर -पथ पर अलौकिक संसार

 

अंबर -पथ पर अलौकिक संसार

 (मुंबई से लेकर वेंकुंवर, कनाडा  के हवाई सफर में )

डॉ मंजु गुप्ता


संस्मरण


   विजिटर वीजा पर मैं अपने पति स्वतंत्र जी के साथ छह माह के लिये 6 फरवरी 2023 को सुबह की साढ़े पाँच बजे की एअर कनाडा की फ्लाइट से  लेंगली  , कनाडा   में शादीशुदा  डॉक्टर बेटी शुचि , दामाद डॉ सिद्धार्थ के घर   के लिए'  भारत के शिवाजी महाराज  अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे' , मुम्बई, महाराष्ट्र से जर्मनी के  फ्रैंकफर्ट अंर्तराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सुबह के दस बजे  पहुँचे। उसी एअरपोर्ट से हमें   कनेक्टिंग फ्लाइट 'लुफ्टहांसा'  से  कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया के वेनकुंवर , कनाडा की फ्लाइट पकड़नी थी।

  पहली बार  कनाडा की विदेश यात्रा करने  हेतु हवाई जहाज से इतना लंबे सफर में  सत्तर की उम्र में बैठे - बैठे थकान आना भी स्वाभाविक था। मेरी खिड़की के पास की सीट होने से अंबर से प्रकृति का  मोहक , अद्भुत ,आकर्षक नजारा जो धरती से नहीं दिखायी देता है।  मैंने विस्मय से देखा।

मैने उन अनंत  क्षितिज के अविस्मरणीय , अप्रतिम , अतुलनीय और  खूबसूरत लम्हों के दृश्यों को कैमरे के साथ  आँखों की कोठरी में कैद किये।

हवाई जहाज की रफ्तार के साथ नीले साफ  असीमित अनंत  गगन -  पथ  को मैं निहार रही  थी ।यही मेरी  खिड़की के पास   से टकराते ,उमड़ते -घुमड़ते सन की यानी  रूई की तरह श्वेत   गोल -गोल छल्लेदार मेघों का समूह  बेफिक्री से मानव द्वारा निर्मित सीमाओं  के ऊपर से अपनी जन्मभूमि, परिवेश  को छोड़कर   धीरे -धीरे बिना जासूसी किये विदेशी व्योम की परिधियों में  एक देश से दूसरे देश को मैत्री का संदेशा लिए  विचरन कर रहे थे। मुझे इन घुमंतू बादलों को देख कर

कालिदास के  मेघदूत का स्मरण हो आया।यक्ष अपनी प्रेयसी यक्षणी को विरह का संदेशा मेघों के द्वारा भिजवाता था।

जिन बादलों को मैंने धरती से नीले आकाश में श्वेत बादलों  के विराट साम्राज्य को विविध स्वरूपों में देखा था । आज मैं  उसी मेघ साम्राज्य को विस्मित नयनों 

से अपने नीचे , दाएँ , बाएँ ,  संग में चलता हुआ देख

 रही थी। कहीं बादलों का कबीला , कहीं राजमहल की रक्षा करते हुए टुकड़े -टुकड़े में खड़ी सेना की टुकड़ियाँ -सी ,कही धवल उबड़ -खाबड़ घना नीरद का समूह आसमान पर  हाथियों के झुंड में नजर आ रहा था।

कहीं पर  विदेशी क्षितिज पर   नीलिमा वाले आसमान पर लालिमा संग सुनहरी स्वर्णमयी  आभा से पल्लवित नारंगी , लाल वर्ण वाला नन्हा  बालक पल -पल में अपने कद में बढ़कर एकदम  गोल   सूर्योदय को  करीब से  मैंने देखा, मेरा मन सत्यम् -शिवम् -सुन्दरम् दृश्यावलियाँ  को देखकर आह्लादित  हो उठा और आनंदित  , आह्लादित दसों  दिशाएँ   स्फूर्ति से भरी भोर की रश्मियों को गले लगाकर सोहर गाती शिशु रवि को गोद में चूम -चूम के दुलार कर रही थीं।

 विराट प्रकृति मेरे करीब थी और मैं बंद विमान के कक्ष में इन पलों को कंप्यूटर की मेमोरी की तरह मन मस्तिष्क के चेतना में संजो रही थी।

समय पंख लगाए हवाईजहाज की तरह गतिमान था।

गोरी -गोरी , छरहरी  खूबसूरत विदेशी परिचारिकाएँ हवाईजहाज में बैठे अंतरराष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी में  

 भिन्न -भिन्न देशों  के यात्रियों से वार्तालाप कर अपनी ट्रालिनुमा मेज पर  सुबह का  शाकाहारी , मांसाहारी नाश्ता   सूची के अनुसार उनकी  रुचिवाले यात्रियों को  अपनी सौम्य  मुस्कान बिखेरती परोस रही थी। मौन शांत परिवेश में   कई यात्री सो रहे थे । आगे बैठी अमेरिकन महिला अपने जुड़वा बच्चों को वहीं दीवार पर लगे  दो  पालने  को खोल कर उनमें सुला रही थी । कोई यात्री चाय  का , कोई जूस का तो कोई कॉफी का और  कोई बियर का शौकीन था। मुझे तो चाय पसंद है , मैंने चाय ली और मेरे पतिदेव ने कॉफी ली। नाश्ता और गरमागरम चाय पीकर   मेरे थके ,  बेल्ट से  बँधे शरीर में ऊर्जा और स्फूर्ति का संचार हुआ ।

  हर नूतन  लम्हा  पुराना पल  बनता जा रहा था । बीते पल को छोड़ता हुआ हवाईजहाज  अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता जा रहा था। खिड़की से मेरी  जिज्ञासु  चक्षु फिर खिड़की  से  पार हुए तभी किसी देश के अंबर -पथ पर  शाश्वत प्रकाश के स्वामी  सजीव , जीवंत साक्षात दिनकर देवता  अपना भोला बचपन की लालिमा छोड़ पीत वर्ण  की चंचल टीन एजर यानी किशोर के रूप में  दिखायी दिए।   नीरवता से भरा शून्य व्योम -मंडल से जगतीतल में धूप बिखेर प्रकृति ,जगत , चराचर की पालनहार बनी  धूप  जंगलों , खेतों आदि के लिये माँ अन्नपूर्णा का रिश्ता निभा रही थी।

कहीं  - कहीं  सघन स्लेटी , काले बादल  चरखा कातती बुढ़िया के रूप अपने काम में व्यस्त थे । तो कहीं  सूरज महाराज बादलों के आँचल में मुँह छिपाएँ 

लुका -छिपी का खेल खेलते मस्त लग  रहे थे। मेरे चक्षु विराट, अतुलनीय , मनोहारी ,अप्रतिम, उदार निःस्वार्थ  प्रकृति का सौंदर्य वैभव  को एक टक निहार रहै थे।  दुनिया के चराचर प्राणियों को   परस्परोपग्रहो जीवानाम्  का संदेशा जैसे वह दे रही हो। चितेरा ईश्वर के जादूभरी, चमत्कारी,  अलौकिक नैसर्गिक चित्रकारी को देखकर मैं

अचंभित हो रही थी। केबिन में बैठा पायलेट द्रुतगति से विमान की  गगनचुंबी उड़ान भर रहा था। सारे क्रूज मेम्बर , परिचारिकाओं पर मेंने दृष्टिपात किया तो वे सब अपनी छोटी -सी कैबिन  में बंद हो आराम कर रहे  थे। मैं इन अद्भुत  दृश्यावलियों में डूबी हुई थी। जो इन नयनाभिराम मंजरों को मेरा रचनात्मक मस्तिष्क अपनी चेतना में  रच रहा था कि सीमाओं में विभाजित विश्व  के सभी देशों का नीला  आकाश एक है , धरती भी एक है।  सभी इंसान के नसों में बहने वाले रक्त का लाल रंग भी एक है जो वसुधैव कुटुम्बकम  और विश्व शांति का संदेश  दे रहा था।







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