*बिखरे घर को समेटती स्त्री*
डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती
बिखरे हुए घर को समेटकर, जो स्त्री काम पर जाती है—
वह महज किसी शौक के लिए नहीं जाती!
वह जाती है, ताकि उसकी भी कोई पहचान बन सके,
थोड़े से पैसे उसके अपने हाथ में आ सकें,
थोड़ी सी आज़ादी की हवा उसे मिल सके,
और वह भी अपना थोड़ा सा आसमान देख सके।
वह घर की देहरी लांघकर जब काम पर जाती है,
तो खुद को कोई 'मेम साहब' नहीं समझती,
वह तो बस खुद को एक ऐसा इंसान मानती है—
जिसे लगता है कि उसने भी समाज में अपना कुछ योगदान दिया है।
उसे 'मैडम' कहलवाने का कोई शौक नहीं,
न ही वह खुद को किसी रानी-महारानी सा देखना चाहती है—
क्योंकि ये शब्द तो अक्सर घर की चारदीवारी में कैद स्त्रियों को
व्यंग्य-बाणों की तरह चुभाए जाते हैं!
तो फिर क्या फर्क पड़ता है,
अगर वह अपनी मेहनत से अपनी एक अलग दुनिया बना ले?
लेकिन अजीब है इस समाज का नज़रिया—
जब वह स्त्री काम पर कोई तरक्की पाती है,
तो लोग न जाने क्या-क्या उसकी पीठ पीछे बकने लगते हैं।
पर असल बात सिर्फ इतनी सी नहीं है...
असली सच तो यह है कि—
स्त्री के अक्ष को, उसके वजूद को,
उसकी आज़ादी और उसकी पहचान को,
यह मर्दवादी समाज आज तक बर्दाश्त ही नहीं कर पाया!
वह समझ ही नहीं पाया उसकी असलियत को।
समाज को लगता है कि घर के कामों से जी चुराने,
या आलस के कारण वह बाहर जाती होगी...
लेकिन नहीं!
घर के अनगिनत कामों से उसे कभी आलस नहीं आता।
पर विडंबना देखिए—
सारे काम तन्मयता से करने के बावजूद,
जब उससे तंज कसते हुए यह कहा जाता है कि—
"तुम सारा दिन घर पर करती ही क्या हो?"
तब उस बिखरे घर को समेटती हुई स्त्री के मन में बस यही टीस उठती है—
कि इस घर को समेटते-समेटते...
उसका अपना पूरा अस्तित्व ही बिखर गया है!
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY