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वटतला का आईना

 

वटतला का आईना

लेखिका:डॉ. मधुछन्दा चक्रवर्ती

यह सन 2000 से 2012 के बीच का कालखंड रहा होगा। उन दिनों अगरतला शहर आज की तरह इतना विकसित और आधुनिक नहीं हुआ था, लेकिन वटतला चौराहा तब भी शहर का सबसे व्यस्त और मुख्य केंद्र था। वहाँ वट (बरगद) का एक बड़ा सा वृक्ष था, जिसके नीचे भगवान शिव और माता पार्वती का छोटा सा मंदिर स्थापित था। उस जगह हमेशा एक अजीब सी हड़बड़ी और कोलाहल का माहौल रहता था। शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक जाने के लिए गाड़ियाँ यहीं से मिलती थीं, जिसके कारण लोगों और वाहनों की भारी भीड़ लगी रहती थी।

चौराहे के एक तरफ बड़ा सा पुल था, जिसके उस पार एक बस स्टैंड था जहाँ से दूसरे शहरों के लिए बसें चलती थीं। वहीं सड़क की दूसरी तरफ, एक संकरी गली के मुहाने पर ऑटो स्टैंड बना हुआ था। पुल के आस-पास कपड़ों की बड़ी-बड़ी दुकानें, खाने-पीने के होटल, बर्तनों के शोरूम और रोज़मर्रा की चीज़ों का एक बहुत बड़ा बाज़ार फैला हुआ था।

उसी दौर की एक दोपहर, मैं कहीं से लंबा सफ़र तय करके लौट रही थी। हमारी बस वटतला चौराहे पर आकर रुकी। किसी तकनीकी कारण या रास्ते के जाम की वजह से बस को वहाँ लगभग ३० से ४५ मिनट तक रुकना पड़ा। बस की खिड़की के पास बैठी मैं बाहर के कोलाहल को देख रही थी। वटतला के पुल के पास गाड़ियों और लोगों की भारी भीड़ थी। उस आधे-पौन घंटे के ठहराव के दौरान, सड़क के उस पार घूमती एक औरत पर मेरी नज़र पड़ी। उस सीमित समय में मैंने उस बेसहारा औरत की बेबसी और बाज़ार के व्यवहार को जिस तरह महसूस किया, उसका आँखों देखा ब्यौरा कुछ इस प्रकार है— वो औरत इधर उधर घूम रही थी, उसके बाल पूरी तरह से बिखरे और गंदे थे।

उसे देखकर ही कलेजा काँप उठता था। पूरे शरीर पर कपड़ों के नाम पर सड़ चुके मैले चिथड़े थे, जो बमुश्किल उसके बदन को ढँक पा रहे थे। महीनों से धूल और धूप झेलते-झेलते उसका पूरा शरीर मैल से काला पड़ चुका था। लेकिन उस भीड़-भाड़ वाले बाज़ार के बीच जो चीज़ सबसे ज़्यादा ध्यान खींचती थी—और जिसे देखकर सभ्य समाज की आँखें शर्म से झुक जानी चाहिए थीं—वह था उसका उभरा हुआ पेट। वह गर्भवती थी।

वह अपनी फटी हुई साड़ी और पेटीकोट को घुटनों के ऊपर उठाए यहाँ से वहाँ बेधड़क घूम रही थी; उसके लिए लोक-लाज के कोई मायने नहीं बचे थे। वह कभी बर्तनों की दुकान के आगे, तो कभी किसी राहगीर के सामने हाथ फैला देती। बाज़ार में आए लोगों में से कोई तरस खाकर उसकी हथेली पर एक-दो रुपये का सिक्का रख देता, तो कोई अपनी 'पवित्रता' बचाने के लिए उसे गंदी गालियाँ देकर वहाँ से दुत्कार देता। लेकिन उसे न तो उन गालियों से कोई फर्क पड़ता था, न ही उन सिक्कों से। उसका कोई घर नहीं था, लगता था जैसे वह वटतला की उसी सड़क पर अन्य भिखारियों के साथ उठती-बैठती थी और रात को वहीं फुटपाथ पर ही सोती होगी। वह बस अपनी फटी-फटी आँखों से भीड़ को निहारती रहती, जैसे उस कोलाहल में भी वह कुछ ढूँढ रही हो।

तभी स्कूल या कॉलेज जाने वाली कुछ किशोर लड़कियाँ वहाँ से गुज़रीं। वे आपस में हँस-बोल रही थीं और उनके चेहरों पर उम्र का अल्हड़पन था। जैसे ही वे लड़कियाँ उस औरत के दायरे में आईं, उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान तैर गई और वह लपककर उनकी तरफ बढ़ी। लड़कियों ने डरकर अपने कदम पीछे खींच लिए।

वह औरत उन जवान लड़कियों की तरफ देखकर अपनी टूटी-फूटी और अस्पष्ट भाषा में कुछ बुदबुदाने लगी। उसकी आवाज़ साफ नहीं थी, लेकिन उसके हाव-भाव और शब्दों के टुकड़ों से साफ झलकता था कि वह मर्दों से मिले धोखे, दुत्कार और अपनी अधूरी, कुचली हुई इच्छाओं की बात कर रही थी। वह बार-बार पुरुषों के विषय में ही कुछ-न-कुछ कहे जा रही थी। ऐसा लगता था जैसे वह उन कमसिन लड़कियों को आने वाले खतरों से आगाह कर रही हो, या फिर अपनी उस बर्बादी की दास्तान सुना रही हो जो किसी धुंधली रात में उसके साथ घटी थी।

आस-पास के दुकानदार और राहगीर उसे देखकर हँसने लगे, "लो, इसकी नौटंकी फिर शुरू हो गई!" किसी-किसी को तो उस पर गुस्सा भी आ रहा था। लेकिन जब तक वह अपनी मनमर्जी से चीख-चिल्ला नहीं लेती थी, उसे चैन नहीं मिलता था। लड़कियों के दूर चले जाने पर वह एक बार फिर ज़ोर से हँस पड़ी। उसकी वह हँसी किसी पागल की हँसी नहीं थी, बल्कि इस पूरी सामाजिक व्यवस्था पर एक करारा व्यंग्य थी—वह समाज की असफलता पर हँस रही थी।

वटतला का वह व्यस्त इलाका जहाँ से पूरे शहर की रौनक तय होती थी, वहाँ खड़े होकर कोई भी संवेदनशील इंसान यह सोचने पर मजबूर हो जाता कि आखिर इस बेचारी की यह हालत कैसे हुई? क्या वह बलात्कार के सदमे से मानसिक संतुलन खो बैठी थी? या फिर वह पहले से ही मानसिक रूप से अस्वस्थ थी और उसकी इस लाचारी का फायदा बाज़ार के ही किसी वहशी दरिंदे ने उठाया था?

जिस समाज और व्यवस्था की ज़िम्मेदारी थी कि वह इस बेसहारा को सुरक्षा देता, तन ढँकने के लिए कपड़ा देता, सम्मान और इलाज देता; उस समाज ने उसे क्या दिया? एक ऐसा ज़ख्म, जिसे वह छुपा भी नहीं सकती थी। उस वहशी ने उसके पागलपन और उसकी गरीबी का मज़ाक उड़ाया था और उसे उस मोड़ पर लाकर छोड़ दिया था जहाँ वह खुद अपनी सुध-बुध खो चुकी थी और अपने पेट में पल रहे उस मासूम, बेगुनाह बच्चे की लाचारी से पूरी तरह बेखबर थी।

तभी मेरी नज़र वट वृक्ष के नीचे बने उस प्रसिद्ध मंदिर पर पड़ी। वहाँ भक्तों की भारी भीड़ जमा थी। लोग हाथ जोड़कर, आँखें मूँदकर बड़े भक्ति-भाव से भगवान के सामने माथा टेक रहे थे और मन्नतें माँग रहे थे। लेकिन कितनी बड़ी विडंबना थी कि उसी मंदिर के ठीक बाहर, सीढ़ियों के पास और सड़क किनारे जो भूखे-नंगे भिखारी, बेसहारा औरतें और मासूम बच्चे घूम रहे थे, उन्हें देने के लिए उन भक्तों के पास कुछ नहीं था। अंदर बैठे पत्थर के भगवान के सामने तो वे अपनी पूरी श्रद्धा और दौलत लुटाने को तैयार थे, लेकिन बाहर जीते-जागते इंसानों को देखकर उनके चेहरों पर गुस्सा और घृणा उभर आती थी; वे उन्हें डाँटकर दुत्कार देते थे।

वहीं पास में सजी कपड़ों, बर्तनों और गरम-गरम खाने-पीने की वे बड़ी-बड़ी दुकानें इस पूरे तमाशे को देख रही थीं। वे अपनी पूरी चमक-दमक के साथ मानो हँस-हँसकर समाज के इस दोगलेपन का विज्ञापन कर रही थीं। वे दुकानें चीख-चीखकर कह रही थीं कि हमारा उद्देश्य किसी नंगे को कपड़ा देना या किसी भूखे को खाना देना नहीं है; हम तो सिर्फ दिखावे और पैसे वालों की जेब भरने के लिए सजे हैं। इस बाज़ार में इंसानियत की कोई कीमत नहीं थी, सिर्फ पैसों की कीमत थी।

धीरे-धीरे बस के प्रस्थान का समय हो गया। ड्राइवर ने हॉर्न बजाया और हमारी बस धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। मैंने खिड़की से पीछे मुड़कर देखा; दुकानों की बत्तियाँ जलने लगी थीं और लोग अपने-अपने सुरक्षित घरों की तरफ लौटने की जल्दी में थे। वह औरत अब भी वहीं सड़क के किनारे अन्य भिखारियों के बीच बैठी, घुटनों में सिर दिए न जाने क्या सोच रही थी। वह इस बढ़ते हुए शहर के बीचों-बीच अंधेरे का एक ऐसा सच थी, जिसे सब देखते तो थे, पर कोई अपनाना नहीं चाहता था।

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