पूजा की थाली और हमारी दोहरी सोच
— डॉ. मधुछन्दा चक्रवर्ती
दुर्गा पूजा का त्यौहार करीब आ गया है। चारों तरफ पंडाल सज रहे हैं और लाउडस्पीकर पर बड़े-बड़े मंत्र गूंज रहे हैं— "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" यानी जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता बसते हैं तो कही माता की भक्ति के गीत बजते हैं। लेकिन जब हम अपने आसपास के समाज को देखते हैं, तो मन में सवाल उठता है कि क्या सच में हम महिलाओं का सम्मान करते हैं?
सच्चाई तो यह है कि हमारा समाज महिलाओं की पूजा भी अपनी सुविधा और पसंद के हिसाब से ही करता है। अगर कोई स्त्री घर की जिम्मेदारी चुपचाप उठाए, त्याग करे और सबकी बात माने, तब तो वह 'देवी' है। लेकिन जैसे ही वही स्त्री अपनी पसंद के कपड़े पहनती है, अपनी मर्जी से जीने की कोशिश करती है या कोई फैसला लेती है, तो समाज तुरंत उसके चरित्र पर उंगली उठाने लगता है। किसी लड़की को जींस या मॉडर्न कपड़ों में देखते ही लोग उसे गलत नजर से देखने लगते हैं। जबकि इसी समाज में हम माँ काली जो उल्लंघ (उग्र) रूप में होती हैं और माँ दुर्गा जो क्रोध में महिषासुर का वध करती हुई नजर आती हैं, उनके इसी रूप की पूजा करते हैं। यह दोहरापन नहीं तो और क्या है? सवाल यह है कि क्या साड़ी पहनी लड़कियों या फिर सलवार कमीज़ पहनी लड़कियों के साथ छेड़खानी जैसी चीजें नहीं होती? मर्यादित वस्त्र पहनने का जो फरमान महिलाओं के लिए है क्या मर्यादित आंखें और सोच पुरुषों के लिए नहीं होने चाहिए?
सोशल मीडिया पर पिछले साल एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें सरस्वती पूजा के दिन कुछ स्कूल अथवा कॉलेज की छात्राओं ने साड़ी पहनी हुई थी परन्तु जिस रास्ते से वे गुजर रही थी वहां अमूमन कई लड़के इन लड़कियों के साथ खुले आम बदतमीज़ी और छेड़खानी करते हुए दिखाई दिए। समाचार पत्रों के आंकड़े तो इससे अधिक चौंकाने वाले हैं।
एक बेटी, बहन, पत्नी या माँ होने के नाते महिला को कदम-कदम पर अपनी सच्चाई की परीक्षा देनी पड़ती है। फिर भी समाज इस भेदभाव पर चुप रहता है। आज भी शादी-ब्याह में दहेज मांगा जाता है, बेटियों के जन्म पर खुशी नहीं मनाई जाती और ससुराल में बहुओं को ताने दिए जाते हैं। हद तो तब हो जाती है जब बलात्कार जैसी घिनौनी घटना होने पर भी कसूर लड़की का ही निकाला जाता है कि वह बाहर क्यों गई थी या उसने क्या पहना था। मासूम बच्चियों से लेकर बुजुर्ग महिला तक सुरक्षित नहीं हैं, फिर भी समाज असली अपराधियों को सुधारने के बजाय लड़कियों पर ही बंदिशें लगाता है। समाज ने महिलाओं के जीवन को इतना सस्ता बना दिया है कि उसके साथ कुछ भी हो परंतु समाज को जैसे कोई फर्क नहीं पड़ता। इतना ही नहीं प्रतिदिन एक महिला मौखिक हिंसा का शिकार होती है फिर चाहे घर हो या फिर बाहर। बेटियों को पढ़ने का अवसर नहीं दिया जाता। परिवार के लिए बेटी की शिक्षा से अधिक उनके अपने सुख, आनंद और तथाकथित मान-सम्मान अधिक प्यारा है। वही समाज जो पूरे साल एक अविवाहित लड़की को जलन, मौखिक हिंसा, शारीरिक हिंसा, बलात्कार का भय, रंग-भेद और भेदभाव आदि से जूझते देखकर चुप रहता है, वही नवरात्रि आते ही उनकी पूजा के लिए उनके पीछे दौड़ पड़ता है। जो समाज किसी के घर बेटी जन्म लेने पर उसे बधाई के बदले ढाढ़स बांधता है, वही उससे उसकी बेटी कन्या पूजन के लिए मांगने लगता है। क्या ये हास्यास्पद नहीं है?
यदि कोई लड़की अकेले अपने घर से दूर नौकरी करती है, तो समाज की नजरों में उसकी स्थिति प्रश्नवाचक बनी रहती है। आज समाज की इतनी विकृत मानसिकता हो चुकी है कि कुछ तथाकथित कथावाचक या कहे धर्म प्रचारक धर्म के नाम पर महिलाओं के लिए ऐसे दोगले विचार रखते हैं। कोई कथावाचक मंच पर बैठकर यह कहने लगता है कि "25 वर्ष की कुंवारी लड़की चार जगह मुंह मार कर आती है," तो कोई महिलाओं को सिर्फ घर में रहने और बच्चे संभालने की सलाह देता है। ऐसे धर्म-ठेकेदारों को यह नहीं दिखाई देता कि गरीब या आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की लड़कियां, या पढ़ाई करती-नौकरी करती लड़कियां अपनी शादी से अधिक अपने जीवन, अपनी पहचान और अपनी क्षमताओं के आयाम खोज रही होती हैं। यही कारण है कि उन्हें इतनी जल्दी विवाह करना पसंद नहीं है। वही कम उम्र की लड़कियों की शादी की वकालत करते समाज के इन ठेकेदारों को यह नहीं समझ में आता कि एक कम उम्र की बच्ची का शरीर कोई खेल का मैदान नहीं है, बल्कि वह अभी भी बालपन और किशोरावस्था के बीच मंझधार में फंसी है। जरूरत है कि आज समाज लड़का और लड़की दोनों को ही सही शिक्षा और समझ प्रदान करे जिससे कि दोनों अपनी जिम्मेदारी समझे और राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे।
हमारा वेद या धर्मशास्त्र कहीं भी महिलाओं को कमजोर या नीचा नहीं समझता। पुराने समय में गार्गी और मैत्रेयी जैसी महान विदुषियां हुईं, जिन्होंने बड़े-बड़े ज्ञानियों से बहस की। लेकिन आज लोग असली धर्म और शास्त्रों की बातें भूल चुके हैं और अपनी सुविधा के हिसाब से महिलाओं पर नियम-कानून थोपते हैं।
आज अगर कोई लड़की पढ़-लिखकर किसी पुरुष से आगे निकल जाती है, तो समाज उसकी तारीफ करने के बजाय उससे जलने लगता है। लड़कियों को बचपन से ही डर के साये में बड़ा किया जाता है। इसके बावजूद आज लड़कियां हर डर को पीछे छोड़कर पढ़ाई, नौकरी और हर क्षेत्र में देश का नाम रोशन कर रही हैं।
अगर हम सच में समाज को बदलना चाहते हैं, तो हमें इस दोहरी मानसिकता को छोड़ना होगा। हमें खुद अपने वेद-पुराणों और ग्रंथों का सही ज्ञान लेना होगा ताकि कोई धर्म के नाम पर हमें और हमारी बेटियों को बेवकूफ न बना सके।
इस दुर्गा पूजा पर सिर्फ मिट्टी की मूर्ति के सामने हाथ जोड़ने से काम नहीं चलेगा। असली पूजा तो तब होगी जब हम अपने घर और आसपास की हर महिला को, उसकी पसंद, उसकी पढ़ाई और उसके फैसलों को बिना किसी शर्त के सम्मान देंगे।
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