अमरजीत
डॉ. मधुछन्दा चक्रवर्ती
बैंगलोर, कर्नाटक
सिलचर के म्युनिसिपैलिटी दफ़्तर की पुरानी इमारत के उस हिस्से में धूप बहुत देर से पहुँचती थी। सुबह-सुबह वहाँ ठंडक रहती थी और पुराने कागज़ों की महक आती रहती थी। मीनाक्षी अपनी मेज पर बैठी हुई फ़ाइलों के पन्ने पलट रही थी। दो बच्चों की माँ, घर में पति और विधवा सास—घर और बाहर की जिम्मेदारियों ने उसे निचोड़ दिया था। अपनी ढलती उम्र, घटती शारीरिक क्षमताओं और जिम्मेदारियों के बोझ से वह हमेशा थकी-थकी सी रहती थी। घर में कुछ समय पहले ही ससुर जी का कैंसर से जूझते हुए निधन हो गया था। उन्हें बचाने के लिए परिवार ने अपनी तरफ़ से हरसंभव कोशिश की थी, यहाँ तक कि उनके इलाज में सब कुछ ख़र्च हो गया था, लेकिन आख़िरकार वे बच नहीं सके। उस गहरे सदमे और इलाज के भारी आर्थिक बोझ ने परिवार की कमर तोड़ दी थी।
मीनाक्षी को दफ़्तर जल्दी आने की आदत थी उसे। अभी तक सब आए नहीं थे। खाली कुर्सियों और शांत माहौल में वह अपने ख़यालों में खोई हुई थी। तभी उसके सामने अमरजीत आ जाता है।
अमरजीत दफ़्तर का डी-ग्रेड क्लर्क था, जिसे सब लोग एक अजीब क़िस्म का इंसान मानते थे। वह रंग का सांवला और काफ़ी मोटा था, जिसकी वजह से चलने-फिरने में उसकी साँसें फूलने लगती थीं। लेकिन उसके चेहरे पर हमेशा एक बेफ़िक्र सी हँसी रहती थी, चाहे हालात कैसे भी हों। अमरजीत की सबसे बड़ी कमी उसका बहुत ज़्यादा बातूनी होना था। उसे काम से ज़्यादा बातें करने में मज़ा आता था। वह दफ़्तर में किसी भी काम के बीच में अपनी तरफ़ से अजीब-अजीब सी सलाह और फ़ालतू का जनरल नॉलेज देना शुरू कर देता था, जिससे लोग परेशान हो जाते थे।
वह मीनाक्षी को गुमसुम बैठा देख बोला, "देखिए मीनाक्षी जी, सेहत के मामले में एक्सरसाइज़ ही सब कुछ है। सुबह-सुबह पाँच किलोमीटर दौड़ना चाहिए।"
मीनाक्षी उसकी बात से चौंक कर उसकी तरफ़ देखती है। उसकी आँखों में प्रश्न है कि आख़िर कब उसने अमरजीत को अपनी सेहत के बारे में कुछ बताया था।
मीनाक्षी बोली, "सर, मुझे क्या हुआ है? मैं तो भली-चंगी हूँ।"
अमरजीत, "वो आप ऐसे बैठी हुई थीं, तो मुझे लगा कि आपकी तसबीयत ठीक नहीं है।"
मीनाक्षी, "अरे, वो तो सुबह की हड़बड़ी और बच्चों की फ़िक्र से मैं थोड़ी चुपचाप सोच में बैठी हूँ।"
अमरजीत, "वो अलग बात है। मैडम, आपको यदि अपने बच्चों के लिए कुछ करना है, तो उन्हें आप बताइए कि कैसे क्या करते हैं। पढ़ाई के साथ-साथ स्पोर्ट्स एक्टिविटी भी ज़रूरी है।"
मीनाक्षी का माथा चकरा गया। उसे बच्चों की फ़िक्र इसलिए नहीं थी कि वे आलसी थे, बल्कि इसलिए कि स्कूल की फ़ीस और घरेलू ख़र्चे बहुत बढ़ गए थे। पति-पत्नी दोनों कमाते थे, लेकिन मकान का किराया, राशन, बच्चों की स्कूल की किताबें, ट्यूशन और न जाने तमाम ख़र्चे थे, जिन्हें वे बहुत मुश्किल से पूरा कर पाते थे। मीनाक्षी को लगा कि अमरजीत से पूछ बैठे कि क्या उसने बच्चे पाले हैं? परन्तु वह चुप रही, क्योंकि बात बढ़ाने से बात बढ़ती है। आख़िरकार वही अमरजीत का फ़ेमस डायलॉग था — "वो अलग बात है!"
मीनाक्षी अक्सर सोचती थी कि यह आदमी कितना अजीब है। एक तो दफ़्तर के काम में बिल्कुल सुस्त था; न तो वह अपना रिकॉर्ड ठीक से रखता था और मौक़ा मिलते ही दफ़्तर के समय से पहले ही चुपचाप वहाँ से खिसक जाता था। दफ़्तर की सुपरवाइजर, स्नेहलता मैम, उसकी इन्हीं हरकतों और काम से भागने की आदत से हमेशा ग़ुस्सा रहती थीं। कई बार सीनियर अधिकारियों से उसकी शिकायत भी कर चुकी थीं, पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा था। मैम ने कई बार उसे डाँटा भी था, लेकिन अमरजीत पर उसका कोई असर नहीं होता था।
उसकी एक और बुरी आदत थी—वह दूसरों की ज़िंदगी में तांक-झांक करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ता था। किसके घर में क्या चल रहा है, यह बात खोद-खोदकर पूछना उसका जैसे शौक़ था। और तो और, कई बार वह इतना लापरवाह हो जाता था कि सबके सामने ही ज़ोर-जोर से पाद देता था, जिससे आसपास बैठे लोग नाक भींचकर रह जाते। कुछ पुरुष सहकर्मी तो उसे डाँट भी देते, तो भी वह 'ही-ही' करके हँस देता था।
एक दिन दोपहर के समय जब सब लोग कैंटीन में बैठे थे, तो किसी बात पर एक सीनियर क्लर्क ने अमरजीत की इतनी बेइज़्ज़ती कर दी कि वहाँ सन्नाटा छा गया। सबके सामने उसे 'निकम्मा' और न जाने क्या-क्या कह दिया गया। मीनाक्षी को लगा कि अब तो अमरजीत दुखी होगा या शर्म से उसका माथा झुक जाएगा। लेकिन उसने क्या देखा? अमरजीत ने हमेशा की तरह अपना गोल-मटोल चेहरा बनाया, एक अजीब सी बेपरवाह हँसी हँस दी और बात को टालने की कोशिश करने लगा।
उसकी उस हँसी को देखकर मीनाक्षी के मन में अचानक एक अजीब सा दर्द उठा। उसे लगा कि यह आदमी चाहे जितना भी हँस ले, लेकिन अंदर से कितना अकेला होगा।
अमरजीत की ज़िंदगी सच में बहुत उलझी हुई थी। वह अपने घर से दूर, इस शहर में एक छोटे से किराए के घर में अकेला रहता था। उसका छोटा भाई अपने घर में अपनी पत्नी के साथ ख़ुशहाल जीवन बिता रहा था, लेकिन अमरजीत के लिए घर के दरवाज़े जैसे बंद थे। शहर में उसकी एक दादी भी रहती थीं, लेकिन उन्होंने भी कभी उसे अपने पास बुलाना सही नहीं समझा। परिवार के किसी भी सदस्य को उससे कोई ख़ास लगाव नहीं था। इस तरह अपनों से दूर और अकेलापन सहते-सहते शायद वह लोगों के बीच आकर बहुत ज़्यादा बोलता था, ताकि कोई तो उसकी बात सुने और उसे यह महसूस हो कि इस दुनिया में वह बिल्कुल अकेला नहीं है।
दिल का वह बुरा नहीं था। एक दिन जब रास्ते में मीनाक्षी की स्कूटी का एक्सीडेंट हो गया था और उसके हाथ में चोट लग गई थी, तब सबसे पहले वही अमरजीत दौड़कर आया था। वह उसे तुरंत डॉक्टर के पास ले गया, उसकी मरहम-पट्टी करवाई और यहाँ तक कि दवाई के पैसे भी अपनी जेब से दे दिए थे। उस दिन मीनाक्षी को समझ आया था कि इस मोटे और बातूनी इंसान के अंदर एक अच्छा दिल भी है। तभी से मीनाक्षी उसे अपने छोटे भाई की तरह देखने लगी थी। वह अमरजीत से चौदह साल बड़ी थी, इसलिए उम्र के इस फ़ासले और इंसानियत के नाते उसके लिए मीनाक्षी के दिल में एक ममता और संवेदना हमेशा बनी रहती थी।
इन सब बातों को सोचते हुए मीनाक्षी को लगने लगा कि अमरजीत की तरफ़ा हालत काफ़ी हद तक उसकी अपनी ज़िंदगी जैसी ही है। बचपन से उसका भी कोई ख़ास दोस्त नहीं रहा था। घर में भाई-बहन होने के बावजूद उसे कई बार अकेलापन महसूस होता था। और वह ख़ुद भी तो अमरजीत की तरह बहुत ज़्यादा बातूनी थी! अपनी निजी ज़िंदगी और घर-परिवार की बातें बिना सोचे-समझे दूसरों के सामने रख देना उसकी पुरानी आदत थी। उससे कभी चुप नहीं रहा जाता था और न ही कोई बात अपने तक रखना उसे आता था। जैसे अमरजीत की बातें सुनकर लोग ऊबने लगते थे, उसी तरह मीनाक्षी से भी लोग ऊब जाते थे।
इसी ज़्यादा बोलने और अपनी ज़िंदगी का हर दुःख-दर्द लोगों को बताने की वजह से उसे भी कई बार अपने सहकर्मियों से बहुत सुनना पड़ा था। लोगों ने पीठ पीछे उसका मज़ाक भी उड़ाया था। हालांकि अब वह ख़ुद को थोड़ा-बहुत संभालने लगी थी, लेकिन पुरानी आदतें इतनी जल्दी कहाँ छूटती हैं!
मीनाक्षी ने अपनी मेज पर रखी चाय की ठंडी होती प्याली उठाई और मन ही मन सोचने लगी—हम सब इंसान भी कितने अजीब हैं ना? हम दूसरों के अकेलेपन और उनकी कमियों पर हँसते हैं, पर यह कभी नहीं सोचते कि हम सबके अंदर भी कोई-न-कोई अधूरापन और छिपा हुआ दर्द पल रहा है।
तभी अमरजीत अपनी सीट से उठा, हाथ में एक नई फ़ाइल ली और हमेशा की तरह मीनाक्षी की तरफ़ देखकर मुस्कुराते हुए बोला, "मीनाक्षी जी, कल रात मैंने एक बहुत अच्छी आर्टिकल पढ़ी थी, अगर आप कहें तो आपको बताऊँ?"
मीनाक्षी ने उसकी तरफ़ देखा, हल्का सा मुस्कुरा दी और फ़ाइल आगे बढ़ा दी। इस बार उसके मन में अमरजीत के लिए कोई झुंझलाहट या ग़ुस्सा नहीं था, बल्कि एक हल्की सी मुस्कान के साथ उसके लिए गहरी संवेदना थी—शायद इसलिए क्योंकि वह जानती थी कि इस बड़ी सी दुनिया में हम सब कहीं न कहीं एक जैसे अकेलेपन से ही जूझ रहे हैं।
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