हेमकूट-वेदी
जब अरण्यानी के वन में
अरणि-उरणि के मध्य
कोई देवता नहीं खींचता था सीमा-रेखा
एक हिमशिशु ने छीन लिया
सूर्य का गायत्री मंत्र
वही मंत्र जिसे घुघुती ने गाया था
बेडू पाको बारामासा
के स्वर में
वही हिमशिशु
जिसकी धाराओं में
सुरक्षित था हेमकूट का
अंतिम पत्र
गिरिश से पूछ बैठा
क्या इसी शिला पर थम जाएगी
महाकाल के तांडव की त्रिशूल-लय
तभी मानसरोवर की लहरों से
उठा स्वर
सुनो! यहाँ तो लिखी है
रूपकुंड की वह गाथा
जब पत्थर हो गए थे राजा-प्रजा
और हिम ने सुन लिया था
धर्म का अंतिम उपदेश
नंदा देवी की डोली उठी
गढ़वाल के उस मौन से
जहाँ चिपको की गोंद से
चिपके थे सिंदूर के पत्ते
मेरा घुघुती-गीत क्यों डूब गया
प्लास्टिक के समुद्र में?
अलकनंदा ने छुआ
भागीरथी का कंठ
मेरे जल में तैर रहे हैं
ऋषियों के मंत्र और
मलबे के कंकर
जब चारधाम सड़क ने काट दिए
मेरी नदियों के स्नायु
तब केदारनाथ के
शिलाखंड ने लिखा
यह तो है भूमण्डलीय ऊष्मीकरण का महिषासुर-मर्दिनी अवतार
हिम तेंदुए ने गिराया
चंद्रमा का टुकड़ा
मैं रखवाला हूँ उस द्वार का
जहाँ से गुज़रती है
समय की हिम-चुप्पी
एक कन्या ने उठाया हिमखंड
यह तो है गिरिराज-तनया का हार
जिसमें पिरोया गया है
कुमारसंभव का वह श्लोक
जिसे कालिदास ने रचा था
ज्वालामुखी के अधरों पर
और तभी सूर्य ने लिख दिया
पर्वत-ललाट पर
अपने तप्त-अक्षरों से
शिलाओं का संवाद कि
पर्वतों की रक्षा ही प्रथम धर्म है।
डॉ. इन्दुमति सरकार
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