Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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भिक्षुक

 
भिक्षुक

वह रोज़ आता है मेरे द्वार पर 
मौन की भाषा में पूछता है—  
क्या बचा है तुम्हारे भोग से  
मेरे भाग्य का अंतिम टुकड़ा? 
मैं दे देता हूँ जो माँगता है  
पर हर बार लौटकर सोचता हूँ
क्या सच में दान दे दिया मैंने  
या अपना अपराध धोया है?  
उसकी आँखों में जो गहरा सूनापन
वह मेरे भरे हुए घर की  
दीवारों से टकराकर  
मुझे रात भर जगाता है  
कल सुबह फिर वही दरवाज़ा
वही हाथ, वही प्रश्न—  
तुम्हारे अतिरिक्त में से  
क्या मेरे लिए कुछ बचा है?
और मैं हर बार की तरह  
उसे देकर भेज दूँगा 
मगर जानता हूँ—  
मेरा दिया हुआ सिक्का  
उसके भूखे पेट से ज़्यादा  
मेरी अंतरात्मा को हल्का करेगाl

डॉ. इन्दुमति सरकार

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