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शोध संदर्भ प्रस्तुतिकरण का "हिंदी शोधार्थी संघ प्रारूप"

 

शोध संदर्भ प्रस्तुतिकरण का "हिंदी शोधार्थी संघ प्रारूप" (HSS format) : एक आलोचनात्मक विमर्श

               - प्रो. (डॉ.) हरदीप सिंह

                 पूर्व प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, 

हिंदी-विभाग, सिक्किम विश्वविद्यालय, गंगटोक


      हिंदी शोधार्थी संघ, भारत के संस्थापक व राष्ट्रीय महासचिव एवं डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा में हिंदी विषय के शोधार्थी श्री कृष्ण कुमार यादव 'कनक' जी के द्वारा शोध संबंधी संदर्भ प्रस्तुतिकरण हेतु प्रस्तुत "हिंदी शोधार्थी संघ प्रारूप" (HSS Format) वास्तव में देवनागरी लिपि में लिखे जाने वाले शोध-पत्रों, शोधालेखों तथा शोध-आख्याओं हेतु एक सरल, भारतीय संदर्भानुकूल और व्यावहारिक प्रयास है, जो हिंदी माध्यम में अथवा देवनागरी लिपि में शोध-पत्र, शोधालेख तथा शोध-आख्या प्रस्तुत करने वाले विद्यार्थियों, शोधार्थियों तथा आचार्यों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। यह प्रारूप सर्वप्रथम कृष्ण कुमार यादव 'कनक' जी ने हिंदी शोधार्थी संघ, भारत के प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन के अवसर पर हिंदुस्तानी एकेडेमी, प्रयागराज के संयुक्त तत्वावधान में वृंदावन शोध संस्थान, वृंदावन के सभागार में "हिंदी की विविध बोलियों में कृष्ण काव्य" विषय पर 23-24 दिसंबर, 2022 को आयोजित होने वाली दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्राप्त होने वाले शोध-पत्रों के संदर्भ प्रस्तुतिकरण हेतु तैयार किया था। उपर्युक्त संगोष्ठी के संपन्न हो जाने के पश्चात् सघन विचार-विमर्श के उपरांत संगठन की प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा हिंदी विषय की शोधार्थी सुश्री चंचल माहौर जी ने इस प्रारूप का नामकरण किया। तदुपरांत संगठन के तत्कालीन वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तथा हिंदी विषय के शोधार्थी श्री विनय कांत केशरी जी ने पूर्व में प्रचलित पद्धतियों तथा इस नवीन पद्धति का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि पूर्व से चली आ रही संदर्भ प्रस्तुतिकरण की पद्धतियों की अपेक्षा एच.एस.एस. पद्धति ही हिंदी माध्यम व देवनागरी लिपि में प्रस्तुत शोध कार्य के संदर्भों की प्रस्तुति हेतु उपयुक्त पद्धति है। 

इस प्रकार हिंदी शोधार्थी संघ, भारत के द्वितीय राष्ट्रीय अधिवेशन के अवसर पर 14 सितंबर, 2023 को सर्व सहमति से इस प्रारूप को औपचारिक रूप से संगठन द्वारा अंगीकृत कर लिया गया तथा संघ द्वारा  प्रकाशित शोध-पत्र संग्रह "शैक्षणिक विषयों के विविध आयाम" नामक पुस्तक में पहली बार इस प्रारूप को प्रकाशित किया गया तथा इसके लक्षणों, शोध के क्षेत्र में उपादेयता तथा हिंदी माध्यम के शोध कार्यों में संदर्भ प्रस्तुतिकरण की अनुकूलता को विस्तार से व्याख्यायित किया गया। भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका "नया ज्ञानोदय" के जून -जुलाई, 2024 अंक में "शोधकार्य और संदर्भ : हिंदी शोधार्थी संघ प्रारूप" शीर्षक से श्री कृष्ण कुमार यादव 'कनक' जी का एक आलेख प्रकाशित हुआ, जिसमें शोधकार्य और संदर्भ पर विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करते हुए उन्होंने "हिंदी शोधार्थी संघ प्रारूप" को भी स्पष्ट रूप से व्याख्यायित किया। 

        वर्तमान समय में संदर्भ प्रस्तुतिकरण का यह नवीन प्रारूप भले ही बहुत अधिक प्रचलित न हो सका हो, किंतु यह कहना कदाचित अतिशयोक्तिपूर्ण न होगा कि यह प्रारूप भविष्य में 'शोध में भारतीयता' की पहचान के रूप में स्थापित होगा। नि:संदेह श्री कृष्ण कुमार यादव 'कनक' जी का प्रयास श्लाघनीय व स्तुत्य है। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत में सवा सौ साल से अधिक समय से हिंदी विषय एवं हिंदी माध्यम में अन्य विषयों में शोधकार्य होता चला आ रहा है, किंतु किसी भी विद्वान अथवा आचार्य ने इस विषय पर ध्यान नहीं दिया कि जब शोध का माध्यम हिंदी है, तो संदर्भ प्रस्तुतिकरण की पद्धति भी हिंदी की लिपि देवनागरी के अनुकूल ही होनी चाहिए। 

ऐसे में ध्यातव्य तथ्य यह भी है कि अमेरिका या अन्य पश्चिमी देशों तथा भारत की संस्कृति, सभ्यता, आचरण, व्यवहार आदि में भी बहुत भिन्नता है; ऐसे में जो कुछ उन देशों के द्वारा कहा जाए या निर्धारित किया जाए, वह भारत के संदर्भ में ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया जाना तर्क संगत नहीं है। अतः इस संबंध में पूर्व में ही निर्णायक विमर्श हो जाना चाहिए था, किंतु ऐसा नहीं हुआ; तथापि इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में इस गंभीर विषय पर अपनी निष्ठा प्रदर्शित करने वाले युवा शोधार्थी श्री कृष्ण कुमार यादव 'कनक' जी निश्चित ही बधाई के पात्र हैं। वे लिखते हैं - "यहाँ यह समझना परम आवश्यक है कि आखिरकार उपयुक्त प्रारूप की आवश्यकता क्यों पड़ीइस संदर्भ में यह बताना है कि भारत में शोधकार्य की परंपरा बहुत अधिक नवीन नहीं है, अपितु वैश्विक पटल पर जब से शिक्षा जगत में शोधकार्य को शिक्षा का अंग स्वीकार किया गया, तभी से भारत में भी शोधकार्य किया जा रहा है; तथापि लंबे समय से शोधकार्य के क्षेत्र में APA (अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन) तथा MLA (मॉडर्न लैंग्वेज एसोसिएशन ऑफ अमेरिका) नामक संस्थाओं द्वारा दिए गए संदर्भ प्रारूप ही प्रयोग में लिए जाते रहे हैं; किंतु ये दोनों ही प्रारूप रोमन लिपि तथा पश्चिमी सभ्यता में प्रचलित ज्ञान को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं"-१ अर्थात् यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि वे पद्धतियाँ अंग्रेजी माध्यम से पश्चिमी देशों में होने वाले शोधकार्यों हेतु तो उपयुक्त हैं, ऐसे में भारतीय संदर्भ में उन्हें अंग्रेजी माध्यम से होने वाले शोधकार्यों में भी ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं किया जा सकता, तथापि यह विषय अंग्रेजी के भारतीय विद्वानों द्वारा विचार किए जाने योग्य है; परंतु हिंदी माध्यम के शोधकार्य के संदर्भ में उन्हें ज्यों का त्यों बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि हिंदी की लिपि 'देवनागरी' है और उसके विराम चिह्न भी रोमन लिपि से भिन्न हैं। इतना ही नहीं, वे पद्धतियाँ भारतीय संस्कारों व संस्कृति के अनुकूल भी नहीं हैं। 

इस संदर्भ में वे लिखते हैं- "हिंदी की लिपि 'देवनागरी' है; जिसके अपने अर्थपूर्ण विराम चिह्न हैं। ऐसे में 'देवनागरी लिपि' में होने वाले शोधकार्यों पर APA अथवा MLA संदर्भ प्रारूपों का प्रयोग किसी भी स्थिति में न्याय संगत नहीं है।"-२ इस कथन से लेखक का अभिप्राय उन विसंगतियों से है, जो इन प्रारूपों में देवनागरी लिपि के संदर्भ में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती हैं। जैसे- देवनागरी लिपि में डॉट (.) का आशय संक्षेपीकरण से है, न कि पूर्ण विराम से। यदि डॉट (.) के स्थान पर पूर्ण विराम (।) का प्रयोग कर भी लिया जाए तो भी पूर्ण विराम चिह्न (।) का प्रयोग, देवनागरी लिपि में संदर्भ देते समय बीच में किया जाना भी तर्क संगत नहीं है। कनक जी आगे लिखते हैं - "इन प्रारूपों के प्रस्तोता भी पश्चिमी विद्वान ही हैंयही कारण है कि उन विद्वानों की दृष्टि में संबोधनों का बहुत अधिक महत्व नहीं है; किंतु हम भारतीयों के लिए संबोधनों का महत्व और गरिमा अनिर्वचनीय है। अर्थात् हम भारतीय कभी भी किसी भी व्यक्ति का नाम बिना किसी उचित संबोधन के लगाए नहीं लेते। उदाहरण के लिए यदि हमें तुलसीदास का नाम लेना हो तो हम उन्हें केवल तुलसीदास नहीं कहेंगे, अपितु गोस्वामी तुलसीदास कहकर संबोधित करेंगे।"-३ निश्चित ही कनक जी का यह तर्क भारतीयता के अनुकूल है। ‌भले ही पश्चिमी विद्वानों का संबोधन का प्रयोग न करने के ‌‌पीछे कोई भी प्रमाणिक तर्क क्यों न रहा हो, फिर भी उसे भारतीयता के संदर्भ में उचित ‌‌सिद्ध नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार व्यक्ति का अंतिम नाम पहले लिखे जाने और मूल नाम बाद में लिखे जाने के पीछे भी पश्चिमी विद्वानों के कठोर तर्क उपलब्ध हैं, किंतु भारतीयता के संबंध में उन तर्कों को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता; क्योंकि भारत में किसी भी व्यक्ति के नाम के उच्चारण का एक विशिष्ट क्रम है। जैसे- पहले संबोधन, फिर प्रथम नाम, फिर मध्य नाम तथा अंत में अंतिम नाम। अतः कनक जी का तर्क भारतीयता के धरातल पर बिल्कुल सत्य सिद्ध होता है। 

        कनक जी ने स्वयं स्वीकार किया है कि जो विचार उनके मन में आज आया है, वह विचार उनके पूर्ववर्ती आचार्यों के मन में पहले ही आ जाना चाहिए था; ताकि शोध में भारतीयता का समावेश पहले से ही बना रहता। वे लिखते हैं- "यद्यपि इस संबंध में बहुत पहले ही विचार हो जाना चाहिए थाकिंतु हिंदी भाषा तथा साहित्य के संरक्षण एवं संवर्धन तथा हिंदी प्रेमियों व हिंदी के शोधार्थियों के हितों के संरक्षण व सहयोगार्थ स्थापित किए गए संगठन 'हिंदी शोधार्थी संघ, भारत' के संस्थापक तथा मुख्य-सचिव के नाते मैंने इस दायित्व का निर्वहन करते हुए भारतीयता तथा देवनागरी लिपि की गरिमा के अनुकूल एक नवीन 'संदर्भ प्रारूप' संगठन के पदाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया। हमारे संगठन की प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री चंचल माहौर जी ने इस प्रारूप का नामकरण किया तथा संगठन के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनय कांत केशरी जी ने कठिन परिश्रम तथा गहनतम जाँच-पड़ताल के पश्चात् इस प्रारूप को देवनागरी लिपि में होने वाले सभी शोधकार्यों में प्रयोग हेतु प्रसारित करने की अनुमति प्रदान की। इस प्रकार 14 सितंबर, 2023 को राष्ट्रीय हिंदी दिवस एवं हमारे संगठन के द्वितीय राष्ट्रीय अधिवेशन के अवसर पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में सर्व सहमति से इस प्रारूप को संगठन द्वारा अंगीकृत कर लिया गया"-४ इस प्रकार वे यह भी स्वीकार करते हैं कि संदर्भ प्रस्तुतिकरण की इस नवीन पद्धति के इस नवीन प्रारूप को पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुरूप ही स्वीकृति मिली है।

       कनक जी ने संबोधनों की एकरूपता के लिए भी उचित प्रावधान किया है। वे 'आवश्यक निर्देश' शीर्षक से लिखते हैं- "उपर्युक्त प्रारूप में संबोधन के रूप में जिन शब्दों का संक्षिप्त रूप प्रयोग में लाया गया हैउनका पूर्ण रूप इस प्रकार है-

डॉ. - डॉक्टर 

प्रो. - प्रोफेसर 

मा. - मान्यवर (केवल पुरुषों के लिए)

आ. - आदरणीया (केवल महिलाओं के लिए)"- ५

         उपर्युक्त अभिकथन में स्पष्ट है कि शोध की औपचारिक प्रकृति के अनुरूप ही कनक जी ने संबोधनों की एकरूपता को भी महत्व दिया है। उनका स्पष्ट मत है कि जिन लोगों को डॉक्ट्रेट की उपाधि प्राप्त है अथवा जो प्रोफेसर पदनाम प्राप्त कर चुके हैं, उन सभी के नामों से पूर्व संबोधन के रूप में उनकी उपाधि या पदनाम का संक्षिप्त रूप (डॉ./प्रो.) प्रयोग किया जाए ; अन्यथा की स्थिति में पुरुषों के लिए मान्यवर (मा.) तथा महिलाओं के लिए आदरणीया (आ.) के संक्षिप्त रूप का ही प्रयोग किया जाए। ऐसा करने से एकरूपता भी रहेगी तथा संबोधन की भारतीय परंपरा का अनुपालन भी होता रहेगा।

          कनक जी संदर्भ प्रस्तुतिकरण करते समय सटीक एवं पूर्ण संदर्भ देने के पक्षपाती हैं। वे मानते हैं कि संदर्भ देने का आशय यह है कि जो कुछ इनवर्टेड कॉमा के अंतर्गत कहा या लिखा गया है वह पूर्णतः प्रमाणिक है। यदि कोई उस तथ्य की सत्यता की जाँच करना चाहे, तो संदर्भ पढ़कर खोज सकता है। ऐसे में यदि संदर्भ अपूर्ण हुआ, तो सत्यता की जाँच कर पाना संभव न हो सकेगा। अतः उन्होंने संदर्भों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है १- पूर्ण संदर्भ २- अपूर्ण संदर्भ ३- असंदर्भ। वे पूर्ण संदर्भ को भी दो श्रेणियों में विभाजित करते हैं। १- सांगोपांग पूर्ण संदर्भ २- मूलांग पूर्ण संदर्भ। इन संदर्भों के प्रकारों में वे 'सांगोपांग पूर्ण संदर्भ' को ही सर्वश्रेष्ठ स्वीकार करते हैं। वे 'सांगोपांग पूर्ण संदर्भ' शीर्षक से लिखते हैं- "जहाँ स्रोत से संबंधित सभी अंगों की संपूर्ण जानकारी स्पष्ट रूप से प्रस्तुत की जाएवे सभी संदर्भ 'सांगोपांग पूर्ण संदर्भ' कहलाएँगे। जैसे- लेखक या संपादक का नाम, पुस्तक या पत्रिका का नाम, आलेख या अध्याय का शीर्षक, आलेख के लेखक का नाम, पृष्ठ संख्या, प्रकाशन का नाम, प्रकाशक का पूरा पता, संस्करण एवं प्रकाशन वर्ष। सोशल साइट के संदर्भ में उस साइट का संपूर्ण पथ परिचय।"-६ 

        इस प्रकार वे शोध के संबंध में 'सांगोपांग पूर्ण संदर्भ' को ही उचित स्वीकार करते हैं। यही कारण है कि उन्होंने इन अंगों के क्रम को भी सुनिश्चित करते हुए एक उचित क्रम में ही प्रस्तुत किया है। जैसे– कोई तथ्य किस के द्वारा, किस पुस्तक के किस अध्याय में किस लेखक द्वारा किस पृष्ठ पर किस प्रकाशन व प्रकाशक द्वारा किस वर्ष प्रस्तुत किया गया। अतः 'हिंदी शोधार्थी संघ प्रारूप' में निर्धारित किया गया क्रम भी पूरी तरह वैज्ञानिक व उपयुक्त है। आइए अब इस प्रकार को थोड़ी गहराई से देखें- 


 1- वैज्ञानिकता:– संरचनात्मक दृष्टि से यह प्रारूप संदर्भ प्रस्तुति के मूल उद्देश्य “सूत्र पहचान और स्रोत-सत्यापन की सुविधा” को पूरा करता है। इसमें लेखक, शीर्षक, पृष्ठ संख्या, प्रकाशक, स्थान और वर्ष सभी आवश्यक घटक व्यवस्थित रूप से एक निश्चित क्रम में दिए जाते हैं। यह गुण इसे APA, MLA, Chicago जैसी अंतरराष्ट्रीय संदर्भ शैलियों के समकक्ष बनाता है, भिन्नता यह है कि इसे भारतीय भाषिक और सांस्कृतिक अनुकूलन में तैयार किया गया है।


2- हिंदी माध्यम के शोधार्थियों के लिए उपयुक्तता :– हिंदी माध्यम से होने वाले शोधकार्यों में अब तक सर्वमान्य रूप से कोई एकीकृत “हिंदी संदर्भ शैली” स्वीकृत नहीं रही है। अधिकांश विश्वविद्यालय MLA या APA का हिंदी रूपांतरण अपनाते आ रहे हैं, जो अक्सर उलझन भरा हो जाता है। इस दृष्टि से "HSS Format" हिंदी भाषा में स्वदेशी शैली का रूप देता है, साथ ही सुगम, व्यवहारिक और एकरूप पद्धति प्रस्तुत करता है। इस प्रकार यह शोध-शिक्षण में समानता व स्पष्टता लाने की दिशा में सार्थक कदम है।


3- स्वीकृति की संभावना:– अब प्रश्न आता है कि क्या इसे स्वीकृति मिल सकती है? जिसका उत्तर है 'हाँ', सैद्धांतिक रूप से मिल सकती है; परंतु व्यवहारिक रूप में इसे शैक्षणिक स्वीकृति (academic acceptance) तब मिलेगी जब इसे कुछ विश्वविद्यालय या शोध संस्थान अपनी शोध-नियमावली में शामिल करें। इस दिशा में कार्य प्रारंभ भी हुआ है। वृंदावन शोध संस्थान, वृंदावन की शोध पत्रिका "ब्रज सलिला" के अक्टूबर-दिसंबर, 2024 अंक से सभी शोध आलेख इसी प्रारूप में आमंत्रित किए जा रहे हैं। कुछ अन्य मान्य शोध-पत्रिकाएँ और शोध-परिषदें भी इसे 'संदर्भ मानक' के रूप में स्वीकार करें तो इसकी स्वीकार्यता शीघ्रातिशीघ्र पूरे भारत में विस्तार पाने में सफल होगी।

        इस प्रकार जब शोधार्थी और प्राध्यापक इसके प्रयोग से संगत और सुसंगठित परिणाम प्रस्तुत करेंगे तब इसकी स्वीकार्यता सर्वमान्य हो जाएगी। इस दृष्टि से यदि हिंदी शोधार्थी संघ, भारत इस प्रारूप को शैक्षणिक मंचों, विश्वविद्यालय संगोष्ठियों और यूजीसी के हिंदी-विभागों के समक्ष औपचारिक रूप से प्रस्तुत करता है, तो इसे निश्चित रूप से एक प्रामाणिक 'हिंदी संदर्भ शैली' के रूप में मान्यता प्राप्त हो सकती है। 

इस दिशा में भी इस संगठन ने प्रयास प्रारंभ किया है। यूजीसी के सचिव प्रो. मनीष जोशी जी से 15,16 तथा 17 नवंबर, 2024 को "भारतीय शिक्षण मंडल" द्वारा गुरुग्राम के एक विश्वविद्यालय में आयोजित 'तीन दिवसीय अखिल भारतीय शोधार्थी सम्मेलन' के अवसर पर व्यक्तिगत भेंट कर श्री कृष्ण कुमार 'कनक' जी ने इस प्रारूप का परिचय प्रदान किया तथा जिन दो कृतियों में इस संदर्भ शैली की व्याख्या प्रस्तुत की गई है, वे भी उन्हें भेंट कीं। नेपाल संस्कृत विश्वविद्यालय, नेपाल द्वारा 28,29,30 जून, श2025 को नेपाल के डाङ क्षेत्र के तुलसीपुर नगर में स्थित विश्वविद्यालय के केंद्रीय सभागार में "शोध पद्धति : कल, आज और कल" विषय पर आयोजित 'तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी' में श्री कृष्ण कुमार यादव 'कनक' जी ने इस नवीन 'हिंदी संदर्भ शैली' पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। इसी क्रम में 3-4 नवंबर, 2025 को हिंदी शोधार्थी संघ, भारत, हिंदी-विभाग, बेंगलूरु विश्वविद्यालय, बेंगलूरु तथा कर्नाटक राज्य विश्वविद्यालय कॉलेज हिंदी प्राध्यापक संघ, कर्नाटक के संयुक्त तत्वावधान में "विश्व तथा भारत के विविध प्रांतों में हिंदी भाषा तथा उसका साहित्य : एक वैश्विक विमर्श" विषय पर आयोजित 'दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी' में भी श्री कृष्ण कुमार यादव 'कनक' जी ने इस नवीन 'हिंदी संदर्भ शैली' पर व्याख्यान प्रस्तुत किया तथा सभी शोध-पत्र इसी शैली में आमंत्रित किए गए। इस प्रकार निरंतर इस दिशा में प्रयास जारी है, जो कि निश्चित ही एक दिन सुखद परिणाम प्रदान करेगा।


4- सकारात्मक पक्ष :– यह संदर्भ शैली पूर्णतः देवनागरी में, स्पष्ट और सुलभ है, अतः हिंदी भाषा तथा साहित्य, समाजशास्त्र, दर्शन, इतिहास एवं अन्य ऐसे विषय जिनमें शोध हिंदी माध्यम से होता हो, उन सभी विषयों के शोध हेतु यह अत्यंत उपयुक्त संदर्भ शैली है। इसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि इसमें भारतीय पते और प्रकाशन विवरण को विस्तार से प्रस्तुत करने की परंपरा को सुनिश्चित किया गया है, जो कि अंग्रेज़ी शैलियों में नहीं होती।


 5- संभावित सुझाव :– यदि भविष्य में इसे और औपचारिक बनाना हो, तो “वेब संदर्भ” में प्रवेश तिथि (Date of Access) जोड़ा जाना और भी उपयोगी हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में उपयोग के लिए ट्रांसलिटरेशन या अंग्रेज़ी रूपांतर का वैकल्पिक प्रारूप भी रखा जा सकता है। एक संक्षिप्त दिशा-पुस्तिका (Manual) तैयार की जाए, जैसे “HSS Citation Manual (2025 Edition)”, जिससे यह अधिक आधिकारिक बन सके।  

        उपर्युक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि “HSS Format” हिंदी शोध जगत के लिए एक ऐतिहासिक पहल है। यदि इसे संस्थागत समर्थन और नियमित प्रयोग प्राप्त होता है, तो यह निश्चय ही हिंदी की पहली सर्वमान्य संदर्भ शैली बन सकती है। 

       नीचे इसका प्रारूप (ड्राफ्ट रूप) दिया जा रहा है, जिसे “हिंदी शोधार्थी संघ प्रारूप (HSS Format)” का संक्षिप्त मैनुअल कहा जा सकता है।


1. मौलिक पुस्तक (Original Book)


रूपरेखा:

(लेखक का नाम : पुस्तक का नाम ; पृष्ठ संख्या, प्रकाशन का नाम, प्रकाशन का पूरा पता ; संस्करण : प्रकाशन वर्ष)


उदाहरण:

आ. मन्नू भंडारी : कथा-पटकथा ; पृष्ठ संख्या - 94-96, लोकमंगल प्रकाशन, सी-5/एस-2, ईस्ट ज्योति नगर, दुर्गापुरी चौक, शाहदरा-110002 ; संस्करण : 2007 ई.


2. संपादित पुस्तक (Edited Book)


रूपरेखा:

(संपादक का नाम : पुस्तक का नाम ; "आलेख का शीर्षक", आलेख लेखक का नाम ; पृष्ठ संख्या, प्रकाशन का नाम, प्रकाशन का पूरा पता ; संस्करण : प्रकाशन वर्ष)


उदाहरण:

आ. अनामिका सिंह, मा. मनोज जैन : आलाप (नवगीत-समवेत संकलन) ; "परंपरा और पिटारी", मा. नईम ; पृष्ठ संख्या - 57-58, शुभदा बुक्स, बी-140/एस-2, शालीमार गार्डन एक्सटेंशन-2, साहिबाबाद - 201005 ; प्रथम संस्करण : जनवरी, 2023 ई.


3. पत्रिका / जर्नल (Magazine / Journal)


रूपरेखा:

(संपादक का नाम : पत्रिका का नाम ; "आलेख का शीर्षक", आलेख लेखक का नाम ; पृष्ठ संख्या, प्रकाशक संस्था का नाम, प्रकाशक का पूरा पता ; अंक : प्रकाशन वर्ष)


उदाहरण:

डॉ. सपना गुप्ता : गवेषणा ; "हिंदी के वैश्वीकरण में अनुवाद की भूमिका", मा. अभिनव कुमार मिश्रा, मा. हर्ष कुमार ; पृष्ठ संख्या - 234, केंद्रीय हिंदी संस्थान, हिंदी संस्थान मार्ग, आगरा-282005 ; अंक -130 : आश्विन-मार्गशीर्ष, 2079/अक्टूबर-दिसंबर, 2022 ई.


4. सोशल साइट / वेब स्रोत (Social Media / Web Source)


रूपरेखा:

(पूरा URL लिंक, प्रवेश तिथि सहित)


उदाहरण:

https://www.vishwahindijan.in/docs/ramvilas-sharma/


(प्रवेश तिथि : 10 अक्तूबर, 2025)


5. संबोधन के मानक रूप: 

संक्षिप्त रूप         -      पूर्ण रूप  प्रयोग हेतु

डॉ.                   -            डॉक्टर (पुरुष/महिला दोनों के लिए)

प्रो.                        -            प्रोफेसर (पुरुष/महिला दोनों के लिए)

मा.                   -            मान्यवर  (केवल पुरुष लेखकों के लिए)

आ.                  -            आदरणीया (केवल महिला लेखिकाओं के लिए)


6. तुलना सारणी (Comparison Table)

तत्व                                                HSS Format                                      MLA Style                                         APA Style

भाषा                                                हिंदी (देवनागरी)                अंग्रेज़ी                                               अंग्रेज़ी

लेखक का नाम क्रम                       संबोधन + पूरा नाम                   उपनाम, नाम                                 नाम, उपनाम

शीर्षक प्रस्तुति                                “:” द्वारा विभाजित                   तिरछा (Italic)                                   तिरछा (Italic)

पृष्ठ संख्या                                  "पृष्ठ संख्या -"                               "p." या "pp."                                    "pp."

प्रकाशक विवरण                               पूरा पता सहित                              केवल प्रकाशक                                   स्थान

वर्ष स्थिति                                   अंत में                                              अंत में                                              अंत में

डिजिटल स्रोत                                पूरा URL + प्रवेश तिथि                 DOI/URL                                            DO


7. विशेष निर्देश:

१- सभी संदर्भों में विराम चिह्नों और रिक्तियों की एकरूपता रखें।

२- संस्करण, वर्ष, और प्रकाशन स्थान अवश्य लिखें।

३- ऑनलाइन स्रोतों में तिथि का उल्लेख अनिवार्य है।

४- यदि दो या अधिक लेखक हों तो उनके बीच अल्पविराम (,) और अंतिम से पहले “एवं” लगाएँ।

५- विदेशी संदर्भों के लिए HSS Format का ट्रांसलिटरेटेड रूप भी तैयार किया जा सकता है।


निष्कर्ष :- “HSS Format” हिंदी भाषा में एक एकीकृत, व्यवहारिक और स्वदेशी संदर्भ प्रस्तुतिकरण पद्धति है, जो शोधार्थियों को अपने स्रोतों को संस्कृतिपरक और वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करने का अवसर देती है।

यह हिंदी शोध परंपरा की अपनी पहचान बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है, जिसका हिंदी शोध जगत में हृदय से स्वागत होना चाहिए।


संदर्भ सूची:- 

१- मा. मधुसूदन आनंद : नया ज्ञानोदय ; "शोधकार्य और संदर्भ : हिंदी शोधार्थी संघ प्रारूप"श्री कृष्ण कुमार यादव 'कनक' ; पृष्ठ संख्या - 74, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, 18, इंस्टीट्यूशनल एरियालोदी रोड़नई दिल्ली - 110003 ; जून-जुलाई : 2024 ई.

२- आ. चंचल माहौरमा. कृष्ण कुमार 'कनक', मा. विनय कांत केशरी : शैक्षणिक विषयों के विविध आयाम ; "हिंदी शोधार्थी संघ प्रारूप (HSS format)", मा. कृष्ण कुमार 'कनक' ; पृष्ठ संख्या - 46, अविकल्प प्राण प्रकाशनप्रज्ञा हिंदी सेवार्थ संस्थान ट्रस्ट, 'कनक-निकुंज', ठार मुरली नगरगुँदाऊलाइन पारफिरोजाबाद - 283203 ; प्रथम संस्करण : 2023 ई.

३- मा. मधुसूदन आनंद : नया ज्ञानोदय ; "शोधकार्य और संदर्भ : हिंदी शोधार्थी संघ प्रारूप"श्री कृष्ण कुमार यादव 'कनक' ; पृष्ठ संख्या - 74, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, 18, इंस्टीट्यूशनल एरियालोदी रोड़नई दिल्ली - 110003 ; जून-जुलाई : 2024 ई.

४- आ. चंचल माहौरमा. कृष्ण कुमार 'कनक', मा. विनय कांत केशरी : शैक्षणिक विषयों के विविध आयाम ; "हिंदी शोधार्थी संघ प्रारूप (HSS format)", मा. कृष्ण कुमार 'कनक' ; पृष्ठ संख्या - 47, अविकल्प प्राण प्रकाशनप्रज्ञा हिंदी सेवार्थ संस्थान ट्रस्ट, 'कनक-निकुंज', ठार मुरली नगरगुँदाऊलाइन पारफिरोजाबाद - 283203 ; प्रथम संस्करण : 2023 ई.

५- मा. मधुसूदन आनंद : नया ज्ञानोदय ; "शोधकार्य और संदर्भ : हिंदी शोधार्थी संघ प्रारूप"श्री कृष्ण कुमार यादव 'कनक' ; पृष्ठ संख्या - 74, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, 18, इंस्टीट्यूशनल एरियालोदी रोड़नई दिल्ली - 110003 ; जून-जुलाई : 2024 ई.

६- आ. चंचल माहौरमा. कृष्ण कुमार 'कनक', मा. विनय कांत केशरी : शैक्षणिक विषयों के विविध आयाम ; "हिंदी शोधार्थी संघ प्रारूप (HSS format)", मा. कृष्ण कुमार 'कनक' ; पृष्ठ संख्या - 44, अविकल्प प्राण प्रकाशनप्रज्ञा हिंदी सेवार्थ संस्थान ट्रस्ट, 'कनक-निकुंज', ठार मुरली नगरगुँदाऊलाइन पारफिरोजाबाद - 283203 ; प्रथम संस्करण : 2023 ई.

 संपर्क:-  

34, पोस्ट ऑफिस स्ट्रीट,

दोराहा मंडी, लुधियाना, पंजाब - 141421

संपर्क सूत्र:- 9417717910

अणु-डाक पता:- bkhardeep@yahoo.com, 

bkhardeep@gmail.com

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