Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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मजबूरी

 

मजबूरी


पन्द्रह जून को आचार्य श्री का लिफाफा मिलते ही राजीव ने सोचा कि इस बार में पूर्ण समय के लिए कन्फर्म हो ही जाउंगा। राजीव ने लिफाफा खोला - 'आपकी सेवाओं की जरूरत नहीं है ' , पढ़ते ही मानो पैरों तले की ज़मीन सरकने लगी। कुर्सी पर निस्तेज होकर ढेर हो गया।

राजीव वर्षों से कालेज में एडहाक अध्यापक की नौकरी कर रहा था।वेतन कम था पर कायमी होने पर वेतन बढ़ेगा इस आशा में नौकरी कर रहा था।

हिमंत झुकाकर आचार्य श्री को मिलकर नौकरी के लिए बिनती करने लगा।

आचार्य महोदय ने कहा - "माफ करना... मैं मजबूर हूं।आपके विषय का कार्यभार नहीं है।"

राजीव आफिस से बाहर नीकला। उनके सामने मां के शब्द गूंजने लगे - "देखो बेटा, इस बार तुम रीटा बहु को अपने साथ अवश्य ले जाना । तेरे बिना उदास -सी‌ दिन काट रही है। तुम मेरी चिंता मत करना।" ।राजीव गहरी सोच में डूब गया।
राजीव ने मां को खत लिखा -"पन्द्रह जून से कालेज खुल रहा है...अच्छे मकान की तलाश में हूं... मिलते ही रीटा को बुला लूंगा।"

राजीव कालेज से बाहर निकल गया, तेज कदमों से चलने लगा, नई नौकरी की तलाश में ।


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