आषाढ़ के बादल
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जब काले बादल, आषाढ़ मास में,
आच्छादित होते, गगन मंडल में।
तब होने लगती है बृष्टि अपार,
चतुर्दिक इस भू-मंडल में।
बादल और बारिश में,
चोली -दामन का रिश्ता होता है।
मोती,गज- मुक्ता हेतु,
स्वाती की बूंद बोता है।
जब करता बादल गर्जन,
नभ- मंडल में घन -घोर।
तब छा जाती खुशियाली,
भू- मंडल में चहुंओर।
गगन मंडल में ऐसा लगता,
बादल की बारात आ रही है। नाचते-गाते आतीस बाजी करते,
परिणय करने बारिश से आ रही है।
बूंदों के नर्तन के साथ
तड़ित फुलझरिया सजाती।
हवाएं ढ़ोल, नगाड़ा, शहनाई बजाती,
और सरिताएं मृदु मंगल गाती।
इन्द्रधनुषी श्रृंगार को देख,
पुलकित होते देवगण!
छा जाती प्रसन्नता सर्वत्र,
हर्षित होते जन-गण-मन।
रिमझिम -रिमझिम के सरगम पर,
बूंदों का मृदुल संगीत।
खुसियां मिलती है अपार,
जैसे मिल गया हो मनमीत।
रचनाकार
डाॅ० बीरेंद्र कुमार मल्लिक
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