-;मैं अयोध्या हूं -;
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अयोध्या शब्द संस्कृत की क्रिया- युद्ध लड़ना, युद्ध छेड़ना की नियमित रूप से बना व्युत्पत्ति है । अयोध्या भविष्य का निष्क्रिय कृदन्त है, जिसका अर्थ है लड़ा जाना ,आरंभिक "अ" ऋणात्मक उपसर्ग है , इसलिए संपूर्ण का अर्थ है लड़ा नहीं जाना चाहिए या संक्षेप में अजेय है । यह अर्थ अर्थवेद द्वारा प्रमाणित है जो इसका उपयोग देवताओं के अजेय नगर को संदर्भित करने के लिए करता है । नौवीं शताब्दी की जैन कविता आदि पुराण में भी कहा गया है कि "अयोध्या केवल नाम से नहीं बल्कि दुश्मनों से अजेय होने की योग्यता से अस्तित्व में आया है ।" लेकिन सत्योपाख्यान इसकी अलग तरह से व्याख्या करते हुए कहता है -"कि इसका अर्थ ये है कि जिसे पापों से नहीं जीता जा सकता है ।"
साकेत इस नगर का पुराना नाम है ,जो संस्कृत जैन बौद्ध ग्रीक और चीनी स्रोतों से प्रमाणित है । आदि पुराण में कहां गया है कि "अयोध्या को अपनी शानदार इमारतों के कारण साकेत कहा जाता है, जिसकी भुजाओं में महत्वपूर्ण बैनर थे ।"
अंग्रेजी में पुराना नाम अवध या औड ही था । 1856 तक यह जिस रियासत की राजधानी थी उसे आज भी अवध स्टेट के नाम से जाना जाता है ।
रामायण में अयोध्या को प्राचीन कौशल साम्राज्य की राजधानी बताया गया है। आदि पुराण में कहा गया है कि अयोध्या अपनी समृद्धि व अच्छे कौशल के कारण सुकोशल के रूप में भी प्रसिद्ध है । आयुत्या ( थाईलैंड )और योग्याकार्ता ( इंडोनेशिया ) ,शहरों के नाम अयोध्या के नाम पर रखे गए हैं ।
हिंदू पौराणिक इतिहास में पवित्र शब्द पुरियों में अयोध्या मथुरा माया हरिद्वार काशी काशी उज्जैनी और द्वारका में अयोध्या को शामिल किया गया है । अयोध्या को अथर्ववेद में ईश्वर का नगर बताया गया है और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है । स्कंद पुराण के अनुसार अयोध्या शब्द "अ " कार ब्रह्मा, " य "कार विष्णु है तथा "ध" कार रुद्र का स्वरूप है ।
अयोध्या में कई महान योद्धा ऋषि मुनि और अवतारी पुरुष जन्म ले चुके हैं । भगवान राम ने भी यही जन्म लिया था । जैन मत के अनुसार यहां आदिनाथ सहित पांच तीर्थंकरों का जन्म
हुआ था । अयोध्या की गणना प्राचीन
सप्त पुरियों में प्रथम स्थान पर की गई है ।
जैन परंपरा के अनुसार भी चौबीस तीर्थंकरों में बाइस इच्छवांकु वंश के थे । इन 24 तीर्थंकरों में से भी सर्वप्रथम तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) जी के साथ चार अन्य तीर्थंकरों का जन्म स्थान भी अयोध्या ही है । बौद्ध मान्यताओं के अनुसार बुद्धदेव ने अयोध्या साकेत में सोलह वर्षों तक निवास किया था ।
सरयू नदी के तट पर बसे इस नगर की विवस्वान ( सूर्य ) के पुत्र वैवस्वत मनु महाराज द्वारा इस नगर की स्थापना की गई । माथुरों के इतिहास के अनुसार वैवस्वत मनु लगभग 6673 ईसा पूर्व हुए थे । ब्रह्मा जी के पुत्र मरीच से कश्यप का जन्म हुआ । कश्यप से विवस्वान और विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु थे ।
पौराणिक कथाओं के अनुसार ब्रह्मा जी से मनु ने अपने लिए एक नगर के निर्माण की बात कही तो वे उन्हें विष्णु के पास ले गए । विष्णु जी ने उन्हें साकेत धाम में एक उपयुक्त स्थान बताया । विष्णु जी ने इस नगरी को बसाने के लिए ब्रह्मा तथा मनु के साथ देव शिल्पी विश्वकर्मा को भी भेज दिया । इसके अलावा अपने राम अवतार के लिए उपयुक्त स्थान ढूंढने के लिए महर्षि वशिष्ठ को भी उनके साथ भेजा । वशिष्ठ द्वारा सरयू नदी के तट पर लीला भूमि का चयन किया गया, जहां विश्वकर्मा ने नगर की निर्माण किया । स्कंद पुराण के अनुसार अयोध्या भगवान विष्णु के चक्र पर विराजमान है ।
बाल्मीकि रामायण के बालकांड में उल्लेख मिलता है कि अयोध्या बारह (12 ) योजन लंबी और तीन योजन चौड़ी थी । सातवीं सदी के चीनी यात्री हवेन सॉन्ग ने इसे " पिकोसिया " संबोधित किया है । आईने अकबरी के अनुसार इस नगर की लंबाई 148 कोस तथा चौड़ाई 32 कोस मानी गई है ।
कोसल नाम मुदितः स्फीतो जनपदो महान ।
निविष्टः सरयू तीरे प्रभूत धन-धान्यम।। (1/5/5)
अर्थात सरयू नदी के तट पर संतुष्ट जनों से भरा उत्तरोत्तर उन्नतिशील कौसल नामक देश था । वाल्मीकि जी आगे लिखते हैं वह पूरी चारों ओर फैली हुई बड़ी-बड़ी सड़कों से सुसज्जित इंद्र की अमरावती की तरह थी । महाराज दशरथ इस पुरी में वैसे ही रहते थे , जैसे स्वर्ग में इंद्र वास करते हैं । महर्षि आगे लिखते हैं–"नगाड़े, मृदंग ,वीणा , पनस आदि बाजों की ध्वनि से नगरी सदा प्रतिध्वनित हुआ करती थी । पृथ्वी पर इसके समान दूसरी नगरी थी ही नहीं ।
विष्णु पुराण में लिखा है कि अयोध्या विष्णु लोक की सबसे सुंदर अप्सरा थी।जिसे भगवान
इंद्र ने वरदान दिया था कि वह कभी बूढ़ी नहीं होगी, और उसका यौवन सदा दिव्य बना रहेगा । श्री राम की जल समाधि के बाद अयोध्या विरान सी हो गई । तब वह राम के पुत्र कुश के पास गई और कुश ने उसे पुनः दिव्य और भव्य बनाया ।
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अथर्ववेद के अनुसार धर्म नगरी अयोध्या देवताओं का स्वर्ग है । स्कंद पुराण के अनुसार सरयू तट पर बसी अयोध्या ब्रह्मा विष्णु व महेश की पवित्र स्थली बताया गया है । अयोध्या नगरी मठ मंदिरों और घाटों की प्रसिद्ध नगरी है । सरयू नदी के किनारे चौदह प्रसिद्ध घाट हैं जिसमें गुप्तार घाट, कौशल्या घाट आज भी दर्शनार्थियों से भरे रहते हैं । इस नगरी में राम का जन्म हुआ था इसी कारण इसे राम जन्मभूमि भी कहते हैं । अयोध्या की कई खासियतें है जो कभी जीता ना जा सके ,जहां कभी युद्ध ना हुआ हो ।
प्रभु राम की नगरी अयोध्या के धार्मिक दृष्टिकोण को लेकर एक कथा खूब प्रचलित है । इसके अनुसार जब अयोध्या के महाराजा विक्रमादित्य एक बार घूमते हुए सरयू नदी के पास पहुंचे उस समय उन्हें वहां कुछ चमत्कार दिखाई दिए । तभी वहां आसपास के संतों ने महाराज विक्रमादित्य को अवध भूमि के धार्मिक महान महत्व के बारे में बताया । इसके बाद विक्रमादित्य ने अयोध्या के मठ मंदिरों का कायाकल्प कराया । इसी के साथ ही अयोध्या नगरी हिंदू धर्म के साथ जैन व बौद्ध धर्म की पवित्र नगरी मानी जाने लगी ।
अयोध्या में कई कुंड और सरोवर हैं धरती का सबसे सुंदरतम धार्मिक स्थान यदि कोई है तो वह धर्म नगरी अयोध्या ही है । जहां साक्षात परमात्मा ने जन्म ले लिया हो उस धरती का बखान शब्दों में नहीं किया जा सकता है ।
अयोध्या आज परिपूर्ण है तृप्तऔर धन्य है। प्रथम जैन तीर्थंकर और बुद्ध जैसे महा मानवों के कालजई उपदेश आज भी इसके स्पंदन में प्रतिध्वनित होते हैं । सिख गुरुओं, सूफी आचायों , रामानुज व रामानंदी सिद्धि साधना का अभसिंचन प्रतिध्वनित होता है जो अयोध्या धरती पर आने से पूर्व भगवान विष्णु के बैकुंठ के केंद्र में स्थापित थी, आज दिव्य भव्य सरयू से अवगुंठित व अभिसिंचितखड़ी है ।अनेक विलक्षण विरासतों के साथ अयोध्या पृथ्वी पर हो कर भी अपार्थिवत एवं जग में रहकर भी जगदीश में लीन है । अयोध्या की महिमा का प्रश्न कभी था ही नहीं । धर्म अध्यात्म संस्कृति और इस राष्ट्र की जड़ों से अनुप्राणित लोगों की भावनाएं, आस्था को अयोध्या अनदेखा नहीं कर सकती । अयोध्या चाहे जितनी वीतराग हो जाए लेकिन ऐसे आकुल भक्तों को अयोध्या का पूरा आशीर्वाद सदा से है ।
अयोध्या के अनुरागी राम भक्त सुदीर्घ और कठिन परीक्षा मे अपेक्षा से अधिक सफल हुए हैं । शताब्दियों के संघर्ष और दशकों के आंदोलन के बाद न्यायालय ने भव्य दिव्य राम मंदिर का मार्ग प्रशस्त किया । अब भव्य राम मंदिर की तरह भव्यतम राष्ट्र के निर्माण का संकल्प लेना आवश्यक है । जिससे भारत पुनह विश्व गुरु के गौरव से समग्र विश्व में स्थापित हो सके ।
संदर्भ :
-- 1, हिंदी वेव दुनिया . कॉम
2,दैनिक जागरण .कॉम 2024
3, महंत रविदास आख्यान ।
डाo अर्चना प्रकाश
गोमती नगर, लखनऊ
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