रिवाज़ ....
रहते थे एक घर में, परिवार एक साथ,
अकेले रहने का, अब चल गया रिवाज।
टूटने लगे हैं घर, जबसे गली- गाँव में,
बच्चों के मन से, बुजुर्गों का मिट गया लिहाज।
दिवार खिंची आँगन में, मन भी बँट गए,
जब से अलग चूल्हे का, चल गया रिवाज।
दीवारें क्या खिंची, माँ- बाप बँट गए,
बताने लगे हैं बच्चे, अब खर्च का हिसाब।
मुश्किल है आजकल, बच्चों को डांटना,
देने लगे हैं बच्चे, हर बात का जवाब।
दिखते नहीं हैं बूढों के भी, बाल अब सफ़ेद,
लगाने लगे हैं जब से, वो बालों में खिजाब।
दौलत की हबस ने "कीर्ति", कैसा खेल खेला,
बदल गया है आजकल, हर शख्स का मिजाज।
डॉ अ कीर्तिवर्धन
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