मैं भी कभी अहंकार से परिपूर्ण था,
ग़लतियों के पुतले समान पूर्ण था।
सोचा विचारा बदलने की ठान ली,
अहंम् तज विनम्रता में सम्पूर्ण था।
जब भी चाहा मैं किसी के काम आऊँ,
अहंकार रोक लेता, कहीं झुक न जाऊँ।
संघर्ष होता अक्सर, दिल व दिमाग़ में,
दुविधा में पड़ा हूँ, सही मार्ग कैसे पाऊँ?
बस यूँ ही उहापोह में, ज़िंदगी उलझी रही,
विनम्रता राह में खड़ी, राह मेरी तकती रही।
गम में दुखी सुख में ख़ुश, एक रोज़ हो गया,
हर पल कदम- कदम, ज़िंदगी बदलती रही।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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