गर्मी की भीषणता, इस जल से न मिट पायेगी,
वृक्ष काट- धरा बंजर की, वर्षा कैसे आयेगी?
शीतल मंद पवन के झौंके, कैसी ठंडी ठंडी छाया,
बिना वृक्ष धरा विधवा सी, अग्निकुंड बन जायेगी|
अ कीर्ति वर्धन

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