भूखा था कई दिन से, मगर रोया नही,
भीड में तन्हां हुआ, मगर खोया नही।
नींद थी मुझ पर हावी, कई दिनों से,
करवटें बदली बहुत, मगर सोया नही।
थी बहुत उपजाऊ मिट्टी, उस खेत की,
आम बोया, बीज गूलर मगर बोया नही।
लिया इम्तिहान धैर्य का, सबने बहुत ही,
हिल रहा था सयंम, मगर डिगाया नही।
गोद में चढा प्यार से, वो गली का बच्चा,
वस्त्र गन्दे हो गये, मैने मगर धोया नही।
था बहुत अपनापन, बच्चे के व्यवहार में,
अजनबी था, आँसुओं से मगर भिगोया नही।
था बहुत कीमती, किसी माला का वो मोती,
टूट कर बिखरा, किसी ने मगर संजोया नही।
डॉ अ कीर्तिवर्धन
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