बिस्तर की सलवटों ने, राज़ खोले हैं कई,
कब तन्हा रातें कटी हैं, राज़ खोले हैं कई।
कब सिसकती कोई कली, रात में कुचली गई,
अंतरंग पलों की दास्तानें, राज खोले हैं कई।
जिस्म की चाहत दरिंदे, देखे कुचलते पुष्प को,
सुबह सलवटों ने रात के, राज खोले हैं कई।
तन समर्पित मन समर्पित, किस्से वफ़ा प्यार के,
बाँहों की बाँहों में समाये, राज खोले हैं कई।
रात भर विरह के आँसू, सुबह तकिया भीगा हुआ,
बेवफ़ा आशिक के किस्से, राज खोले हैं कई।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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