साध्वी ऋतम्भरा जी, परमानन्द जी महाराज अनिरुद्धानन्द जी की बातों पर आग बबूला लाल पीला होने वाले या तो स्वयं सच्चाई देखना नही चाहते या केवल वाम चिंतन से ग्रसित हैं। पहली बात तो सन्त सचेत कर रहे हैं, थोप नहीं रहे। दूसरी बात जो कहा गया वह सार्वभौमिक सत्य यानि सब पर लागू नहीं होता परन्तु प्रवृत्ति दिन प्रतिदिन बढ़ रही है।
विचारणीय
बेटियों को लेकर संतों के बयान पर समाज में बहुत जगह आक्रोश है, होना भी चाहिये।
परन्तु प्रश्न क्या था, किन परिस्थितियों में किया गया, उसका उत्तर अलग अलग होगा।
वर्तमान में बेटे और बेटियों की आयु तीस वर्ष से चौंतीस पैंतीस तक हो रही है, इसका मतलब सबकी नहीं अपितु कुछ की जिसके कारण उनके माता-पिता चिंतित हैं। शादी नहीं हो रही या अपनी महत्वाकांक्षाओं के कारण कर नहीं पा रहे, कोई लिव इन में रह रहा है तो कोई आजादी का बिगुल बजा रहा है किसी को पद पैसे की चाह है, कारण बहुत से हो सकते हैं। विचार कीजिये क्या यह भारतीय परिवार सिस्टम को तोड़ने की सुनियोजित साजिश तो नही है?
हमारे मन मस्तिष्क में फ़िल्मों टीवी सीरियलों सीरीज़ के द्वारा उन्मुक्त जीवन का ज़हर बोया जा रहा है। जिसमें वाम पंथ का बहुत बड़ा योगदान रहा है।
समाज में संतों को मार्गदर्शक कहा जाता है। उनकी सलाह सुझाव पर अमल करना या नहीं करना आपके विवेक पर निर्भर करता है। सरकार ने शादी की आयु अट्ठारह व इक्कीस वर्ष निर्धारित की।
बच्चे पढ़ें आगे बढ़ें तो क्या इसका अर्थ निरंकुश होना है अथवा समझदार बनना।
आज परिवारों में बच्चों की शादी में माता-पिता का दायित्व शून्य हो चुका है। देर में शादी होने लगी, समाज परिवार का महत्व निजी सुविधाओं और जीवन पर खत्म होने लगा। परिवारों में तनाव घुटन कुंठा बढ़ रहा है । अलगाव व तलाक़ के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि, कचहरियों में तलाक़ वालों की भीड़ वकीलों की लूट, चरित्र हनन, परिवार वालों को जेल, तलाक़ में समझौते के नाम पर मोटी मोटी डिमांड, आत्म हत्याएं,
विचार करिये यह सब क्या हो रहा है, हम कहाँ जा रहे हैं?
क्या यह भारतीय संस्कृति का पाश्चात्य करण नहीं हो रहा है जहाँ उन्मुक्त उन्मादी जीवन, मूल्यों के प्रति नकारात्मकता, सैक्स को प्रमुखता व सुलभता, बच्चों व समाज के प्रति दायित्व से मुक्ति, सम्बंधों के निर्वहन के लिये वर्ष में एक दिन जैसे माता दिवस पिता दिवस परिवार दिवस? एक व्यक्ति पता नहीं कितनी पत्नियाँ और सबके अलग-अलग बच्चे, एक महिला कितने पति किससे बच्चा पिता कौन, परिणाम अनाथ आश्रम या लावारिस की श्रेणी।
पश्चिम जगत में यह सब आम था जो अब हमारे यहाँ भी होने लगा। अगर संतों ने समस्याओं को ध्यान में रखकर कुछ सुझाव दिये तो लिबरांडू गैंग प्रहार करने लगे। जो विरोध में खड़े हैं क्या उनको कोई नुक़सान है संतों के बयान से? जी हाँ उनकी दुकान बंद हो जायेगी जिसके लिए विदेशी फंडिंग होती है।
गौर कीजिये कभी दौर चला था कन्या भ्रूण हत्या का। कभी बेटियों को आजादी का। आज बेटियों को विज्ञापन बना दिया गया है। बीड़ी सिगरेट शराब कंडोम कार मकान टीवी फ्रिज, यानि कोई भी वस्तु बिना महिला के विज्ञापन में नहीं दिखेगी।
अब सोशल मीडिया पर पढ़ी लिखी लड़कियाँ महिलायें रील बना रही हैं नग्नता का फूहड़ प्रदर्शन चल रहा है। यह सब निर्धारित एजेंडे के तहत ब्रेन वाश किया जाता है। टारगेट पर हैं सनातन की बेटियाँ।
क्या आपको पता है भारत से पाँच लाख बेटियां प्रतिवर्ष गायब हो रही हैं, कहाँ जा रही हैं? किसी के पास जवाब नही। कंडोम और गर्भ निरोधक दवाओं के बाज़ार के आँकड़े इंटरनेट पर पढ़ो, कौन खरीद रहा है और प्रयोग कर रहा है? प्राइवेट अस्पतालों में गर्भपात और अनाथ आश्रम में बच्चे कौन हैं?
शिक्षित होकर आगे बढ़ने का संकल्प और संस्कार संस्कृति का समन्वय दक्षिण भारतीय महिलाओं में देखने को मिलता है। दुनिया के शीर्ष पदों पर पुलिस वैज्ञानिक अंतरिक्ष डॉक्टर नर्स कुशल राजनेता बड़ी बड़ी कम्पनियों में शीर्ष पदों पर दक्षिण भारतीयों को प्रमुखता से देखा जा सकता है। उनका अपनी परम्पराओं से निर्वहन माता पिता समाज के प्रति दायित्व उन्हें अग्रणी बनाता है।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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