उम्र का अन्तिम पहर, प्रभु स्मरण कीजिये,
कुंठित मन को भी, विश्राम करने दीजिये।
जो मिला आभार उसका, भाव मन लाइये,
मृगतृष्णा भटकता मन, धर्म कर्म लगाइये।
कुंठाएँ जीवन में हों, मानव को डस लेती हैं,
सोच दूसरे को हर पल, खुद को डस लेती हैं।
क्या प्रभु ने दिया उसे, जो अपने पास नहीं है,
इच्छाओं की नागिन, तन मन को डस लेती है।
तस्वीर के दो पहलू, आगे अच्छा- पीछे देखिये,
फ़क़त अपने नज़रिये, दुनिया न देखा कीजिये।
है बहुत कुछ अच्छा भी, विचार कर देखना उसे,
छोड़ कर अपने अहम् को, संतुष्टि भाव लीजिये।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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