वृत्ति हमारी नदी की, धार सी चलायमान है,
बह रही जल मीठा लेकर, खारा मुकाम है।
लेकर चली मीठा जल, खुद की पहचान थी,
मिट गयी सागर में जाकर, सागर ही नाम है।
प्रवृति हमारी भागते हैं, अर्थ के पीछे सभी,
परोपकार छोड़ कर, स्वार्थ लिप्त रहते सभी।
दानवता के भाव, खुद के लिये जीने की चाह,
प्रवृत्ति हमारी अपनों हित, दाँव पर होता सभी।
देखकर माया का कारा, निवृत्ति होने लगी,
श्मशान वैराग्य के समान, विरक्ति होने लगी।
जिनकी खातिर जी रहे थे, मोह के वशीभूत हो,
सोच कर व्यवहार उनका, निवृत्ति होने लगी।
धर्म कर्म ज्ञान का, उपदेश जिनकी वृत्ति थी,
पास जाकर देखा समझा, स्वार्थ ही प्रवृत्ति थी।
सोचते जिनको मसीहा, अर्थ के वशीभूत मिले,
था सभी कुछ त्याज्य जो, मोक्ष से निवृत्ति थी।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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