उम्र का यह दौर चौथा, हम तन्हा रह गये,
रिश्तों को सँवारा नही, अब तन्हा रह गये।
पंख मिले बच्चों को, निज नीड़ चुन लिया,
नज़रें टिकाए द्वार पर, सब तन्हा रह गये।
जब तलक जवान रहे, खुद पर गुरूर खूब था,
पैसों से सब खरीद लेंगे, यह भ्रम भी खूब था।
सजदे में झुकते बहुत, जब तलक कुर्सी रही,
सोचते थे खुद को खुदा, अहंकार भी खूब था।
छूटे हुए कारतूस हम, फ्यूज बल्ब से पड़े हुए,
सुनता नहीं कोई भी अब तो, व्यर्थ से पड़े हुए।
सठिया गया है बूढ़ा, पत्नी भी अब कहने लगी,
अर्थ से आश्रित नहीं, फिर भी बेशर्म से पड़े हुए।
समाज से विलग रहे, परिवार संग जुड़े नही,
मैं- मेरे को सब समझा, समाज संग जुड़े नही।
थे मेरे जो भी अपने, अब कहाँ किस हाल में हैं,
सम्पर्क करना जब भी चाहा, कोई भी जुड़े नही।
खायी थी कसमें जिन्होंने, जीवन भर साथ निभाने की,
साथ वह भी देते नहीं, बात करते थे जीने मर जाने की।
बात करते जब भी बच्चे, सुख सुविधाओं की बात होती,
मन की पीर तन्हाई अपनी, समझ बची नहीं समझाने की।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY