सजल की सरगम
सजल नेत्र क्यों ग़ज़ल आज खड़ी हुयी है,
उर्दू पर इतराती, हिन्दी पर झिझक रही है?
रंग रूप इश्क़ कसीदे, महफ़िल रहने वाली,
सरल सौम्य सजल सम्मुख झिझक रही है?
जी हाँ, लम्बे समय से मौजूद ग़ज़ल को चुनौती देती हिन्दी सजल विगत दस वर्षों मे बाल्यकाल से निकलकर यौवन के कगार तक आ चुकी है। ग़ज़ल के इतिहास को जानने का प्रयास करने पर पाते हैं कि मुगल शासकों की महफ़िलों में इश्क़ हुस्न की तारीफ़ में पढ़े जाने वाले कसीदे शेर शायरी ग़ज़ल के रूप में कहे जाते थे। सामान्यतः तवायफों रक्काशाओं द्वारा नृत्य मुजरों के दौरान गजलों को गाया जाता था। समय के साथ अनेकों हिन्दी कवियों/ साहित्यकारों ने भी ग़ज़ल को लिखने पढ़ने के प्रयास किये। कालांतर में हिन्दी कवियों द्वारा ग़ज़ल को इश्क़ हुस्न के दायरे से बाहर निकाला और सामाजिक सरोकारों से जोड़ना प्रारम्भ किया। जिसमें दुष्यन्त कुमार को अपनी शेरों से विशेष उपलब्धि मिली और ग़ज़ल को नये कलेवर में स्थापित करने में मन सफल हुये।
“कौन कहता है आसमाँ में सुराख़ हो नहीं सकता,
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।”
परन्तु हिन्दी ग़ज़ल अपने उर्दू मोह को तज नहीं पायी। उर्दू फ़ारसी शब्दों की बहुलता व जटिलता दोनों का वर्चस्व उसमें बना रहा।
फिर भी विषयों की विविधता व सामाजिक सरोकारों को रेखांकित करती ग़ज़ल की आधुनिक शैली में अनेक ग़ज़लकारों पाठकों व श्रोताओं को भरपूर अवसर दिया।
मनुष्य की प्रवृत्ति 
सदैव कुछ नया करने की रहती है। उसी कड़ी में लगभग एक दशक पहले कुछ साहित्यकारों द्वारा ग़ज़ल के नये प्रतिमान या नयी शैली विकसित करने का निर्णय लिया गया। जिसके लिये कुछ नियमों का निर्धारण कर हिन्दी ग़ज़ल को पुनः परिस्कृत कर सजल नाम से प्रारम्भ किया गया। जिससे पुरानी ग़ज़ल जो महलों की शान थी, कहीं हाशिए पर खिसकने लगी—
कभी तवायफों के द्वारा गायी जाती ग़ज़ल,
सड़क चौराहों गली नुक्कड़ सिसक रही है।
जन जन की बातें करती सजल नवयौवना,
रुनझुन बजती पायल सबको मोह रही है।
पलकें लाज का घूँघट झुके नयन की ओट,
सबके मन की बातें आज सजल कर रही है।
जेठानी ग़ज़ल घर में अकड़ अकड़ चलती,
अल्हड़ देवरानी हँसते हँसते किलक रही है।
नित नये शब्दों का गुंथन नित नयी मालाएँ,
मर्यादित गीतों का सृजन सजल कर रही है।
सजल के इतिहास व व्याकरण पर चर्चा कर ज्ञान सागर उड़ेलने का कोई महत्व हमें नजर नही आता अपितु श्री विजय राठौरजी के सजल संग्रह “धूप की चिट्ठियाँ“ की बात करना चाहते हैं।
श्री विजय राठौर जी जाँजगीर चम्पारण छत्तीसगढ़ के निवासी व वरिष्ठ साहित्यकार है । पूर्व में भी आपके अनेक गीत संग्रह नवगीत संग्रह, ग़ज़ल संग्रह, सजल संग्रह, मुक्तक व काव्य संग्रह, खण्ड काव्य य, दोहा संग्रह, छंद संग्रह, पंजाबी के अनुवाद व अन्य विषयों पर पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आपका कार्यक्षेत्र बहुत विस्तृत है। अगर हम सजल की ही बात करें तो चाँद पर घर बना कर देखेंगे, सच का गोमुख बंद है, सबके हिस्से में सूरज है, रिश्तों की तुरपाई हो, धूप बहुत है छाया कम, बात करो तो मिश्री घोलो, एक टुकड़ा धूप का, छंदों की लहर पर तैरती सजल, आँख का यह सिन्धु खारा है तथा धूप की चिट्ठियाँ महत्वपूर्ण संग्रह हैं।
धूप की चिट्ठियाँ हमारे पास है जिसे हमने भी पढ़ने का प्रयास किया। मनुष्य और मानवता का आधार विनम्रता होता है। विजय जी मनुष्यता के पोषक व संरक्षक हैं। तभी तो अपनी सजल फल आने पर झुकती……में कहते हैं
फल आने पर झुकती ही हैं डालियाँ,
पकवानों से सजी रहें सब थालियाँ।
मिलती है धिक्कार अगर है बात बुरी,
अच्छी बातों पर बजती हैं तालियाँ।
आवरण शीर्षक धूप की चिट्ठियाँ आकृष्ट करता है। तो इसका विस्तार अपने भीतर समेटे बेटियों के श्रम व उपलब्धियों को रेखांकित करता है-
वृक्ष पढ़ते रहे धूप की चिट्ठियाँ,
स्वर्ण लाती रहें जीत कर बेटियां ।
चाहिये आज ताजी हवाएँ हमें,
खोल दें आज हम मानसिक खिड़कियाँ।
याद तुमको हृदय से किया है प्रिये,
आ रही हैं तुम्हें इसलिए हिचकियाँ।
विषयों की विविधता के साथ प्रेयसी की हिचकियों का गणित तो आँखों के द्वारा प्रेम निमंत्रण पर भी कवि सजल के माध्यम से कहता है-
सबसे पहले प्रेमिक चिट्ठी करती है जारी आँखें,
साथ नहीं मिलता तो बरबस हो जाती खारी आँखें।
इतनी सुन्दर यह दुनिया है पग पग मोहक दृश्य दिखे,
नहीं सुहाती उनको जो हैं क़िस्मत की मारी आँखें।
जिस प्रकार राठौर जी की लेखनी किसी एक विधा की मोहताज नहीं रही उसी प्रकार उनकी सजल ने भी विषयों को विस्तार दिया है। सोते हुए समाज को जगाने का प्रयास करती एक सजल—
है सुबह की घड़ी नींद से जागिए,
आज मुश्किल बड़ी नींद से जागिए।
तंत्र ने लोक आज अगुवा किया,
मारता है छड़ी नींद से जागिए ।
श्री विजय राठौर जी यूँ तो विज्ञान के विद्यार्थी व प्रशासनिक अधिकारी पद से सेवानिवृत्त हुए परन्तु सामाजिक सरोकारों व दायित्वों के प्रति सदैव सजग व समर्पित रहे जो कि उनके साहित्य में दृष्टव्य है। एक बानगी बच्चों के प्रति उनके सरोकार—
ज्ञान और विज्ञान बढ़ाएँ,
मातृभूमि की शान बढ़ाएँ।
ख़ाली हाथ हमें जाना है,
ज़्यादा क्यों सामान बढ़ाएँ।
हाथ बढ़ाएँ मिलना हो तो,
खुद चलकर पहचान बढ़ाएँ।
विजय जी की सजलें विविध आयामों/ विषयों व सामाजिक सरोकारों को एक साथ लेकर चलती हैं। जिसमें सजल के निर्धारित नियमों व प्रावधानों का पूर्ण निर्वहन किया गया है। जैसा कि अपनी बात में विजय जी ने इंगित किया है कि वर्तमान में सजल के स्थापित रचनाकार ३०० से ४०० के लगभग हैं तथा सजल ने अपनी यात्रा के प्रथम सोपान में ही विश्वविद्यालयों तक पहुँच कर शोधार्थियों के लिये अपनी महत्ता तथा अस्तित्व का एहसास कराया वह महत्वपूर्ण है। राठौर जी की सजल के विषय समाज में व्याप्त बुराइयों पर प्रहार करते हैं धर्म की स्थापना का पक्ष लेते सत्य मार्ग पर चल मानव बनने की प्रेरणा देते हैं। नेता गुरु चोर पाप पुण्य पर्यावरण प्यार प्रेम इश्क़ हुस्न नफ़रत वैराग्य यानि सभी लिबरेशन उन्होंने कमोबेश सजल की सरलता के साथ उकेरा है। राजनीति में अपराधियों के बढ़ते प्रभाव पर भी वह चिंतित हो उठते हैं—
चोर उचक्के हैं संसद में,
छोटापन है उनके क़द में।
हम इतना ही कहना चाहते हैं कि सजल सदैव से भारतीय है। आदिकाल से प्रारंभ गीत दोहों को नये कलेवर फ़्लेवर में समाज हित लाने का श्रेष्ठतम प्रयास है सजल। आज सजल रंग रूप परिधान आचार विचार व्यवहार सरोकारों के साथ साहित्य की प्रमुख विधा बनने को आतुर है। जिसके लिए श्री राठौर जी भी बधाई के पात्र हैं जिन्होंने विस्तृत सृजन कर सज। को नये मुकाम व आयाम तक पहुंचाया । संप्रेषण की दृष्टि से भारत में और विशेषकर हिन्दी भाषी क्षजमें सजल का स्थान ग़ज़ल से बेहतर बनता जा रहा है।
हमें विश्वास है कि शीघ्र ही विजय जी की सजलें शोध का विषय बनेंगी और जनमानस में लोकप्रियता व ध्रुव स्थान प्राप्त करेंगी। श्री विजय राठौर जी को अनेकानेक शुभकामनाएँ।
निश्चित ही पाठक इन सजलों से गुज़रते हुए स्वयं को इनके आसपास पायेंगे। और हमें लगता है कि किसी रचना और रचनाकार का श्रेष्ठतम पुरस्कार भी यही है कि पाठक स्वयं को उससे आत्मसात् कर ले।
पुनः बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ।
समीक्षक
डॉ अ. कीर्ति वर्द्धन
५३ महालक्ष्मी एनक्लेव
मुज़फ़्फ़रनगर-२५१००१ उत्तर प्रदेश
मोबाइल 8265821800
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