सबकी अपनी अपनी ख़ुशियाँ, अपनी अलख जगाई है,
सबकी अपनी अपनी बगिया, अपने ढंग से सजायी है।
सपने तो सबके अपने, पर सुख दुःख कब तन्हा होते,
तन्हा रहने की चाहत दिल ने, पीर की सोहबत पायी है।
रात रात भर जगते रहना, भोर हुई बिस्तर में जाना,
मानव तन- मानव की योनि, गति उल्लू की भायी है।
ख्वाब कहाँ पूरे हो पाते, जो सोते में देखे जाते,
खुली आँख के स्वप्न हों पूरे, जीवन की सच्चाई है।
संस्कार संस्कृति सभ्यता, इनको धारण करना होगा,
विनम्रता- व्यवहार कुशलता, सफलता की परछाईं है।
तेज आँच पर दूध उबलता, बर्तन से बाहर गिर जाता,
धीमी आँच पका कर देखो, सोंधी खुशबू समाई है।
खूब कमाओ धन दौलत पर, मानवता जिन्दा रखना,
अहंकार थोड़ा भी होगा, समझो दानवता भरमायी है।
सन्तानें संस्कारवान हों, धन दौलत से बड़ी उपलब्धि,
आवारा सन्तान हुयी तो, पुरखों की शान गँवायी है।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY