रिश्ते बचाने के लिए, मैं झुकता गया,
कमर टेढ़ी हो गयी, मैं झुकता गया।
जितना भी झुका, रिश्ते सिर उठाते गये,
लेटने की इन्तिहां तक, मैं झुकता गया।
झुकते झुकाते मस्तक, अभिमान मर गया,
इतना झुका झुकाया, कमर में ख़म पड़ गया।
आँसू बहा- बहाकर, रिश्ते बचाने में लगा रहा,
झुकने झुकाने में ही मेरा, यौवन निकल गया।
किसने समझा दर्द मेरा, क्यों झुका हूँ,
बढ़ रहा था मंज़िल तक, क्यों रुका हूँ?
विनम्रता को सबने, कमजोरी समझा,
रिश्ते बनाने के लिये, सबसे ही ठुका हूँ।
फ़ुटबॉल के माफ़िक़, लुढ़काया गया,
जिसे जब ज़रूरत पड़ी, दौड़ाया गया।
इस दर से उस दर, काम से उस काम,
एक बार मना किया, ठुकराया गया।
परिवार में रिश्ते रहें, चाहत यही रही,
दूर रह भी मिलते रहें, चाहत यही रही।
अधिकार सबके रहे, बस कर्तव्य मेरा,
प्यार से मिलकर रहें, चाहत यही रही।
छोड़ कर घर और जर, अकेला रहने लगा,
घर तोड़ने के ताने, अपनों के सहने लगा।
कोई बात भी नहीं करता, अब तन्हाई में,
दर्द खुद का किससे कहें, मौन रहने लगा।
मेरे मौन को अहंकार बताया जाने लगा,
मेरे अपनों के द्वारा ठुकराया जाने लगा।
मुझ पर ही आरोप लगाये, स्वार्थी होने के,
उपेक्षित अहसास करा, सताया जाने लगा।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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