Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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रह गया हूँ मैं अकेला

 

रह गया हूँ मैं अकेला, रिश्तों के संसार में,
सच का साथ गुनाह, रिश्तों के व्यवहार में।
धूल खुद के चेहरे पर, दर्पण को दोष क्यों?
बस इतना ही कहा था, अपनों को प्यार में।

जो मेरे अपने सगे थे, आज वह दुश्मन बने,
साथ रहते एक घर में, दिखते सब तने तने।
ज़िम्मेदारी का निर्वहन, करना मेरा कर्तव्य,
अधिकारों से वंचित, मुश्किल रिश्ते निभने।

मेरे अपने ख़ास भी, पागल मुझे कहने लगे,
जिनकी खातिर सब लुटाया, मुझे सहने लगे।
रिश्तों की नींव जब, झूठ पत्थर से बनी हो,
रेत की दीवार पर घर, हवा चली ढहने लगे।

अ कीर्ति वर्द्धन

53 महालक्ष्मी एनक्लेव 
मुज़फ़्फ़रनगर उत्तर प्रदेश 

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