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Dr. Srimati Tara Singh
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पत्नी की बातें

 

पत्नी की बातें

बड़े प्यार से पत्नी आई, करती हुई मनुहार,
आकर बोली खाने में, क्या खाओगे सरकार?
तबियत कुछ नासाज़ थी, हमने किया विचार,
डरते डरते कह दिया, खिचड़ी दही संग अचार।

मेरा तो मन जरा नही, पत्नी ने आदेश सुनाया,
बच्चों को पनीर पसन्द है, आज वही बनवाया।
खिचड़ी- तौरी- लौकी, मूँग दाल हमेशा भाती,
तुमको भाता उबला खाना, हमें चटपटा ही भाया।

वैसे भी तो दाल मूँग की, ख़त्म हुई है अरसे से,
तुमको पहले बोला था, लाये कहाँ हो परसों से।
चुप रहना बेहतर समझा, और विनम्रता से बोले,
जो भी है वह ले आओ, बना- बचा हो तरसों से।

अभी बना घर में जो, सबके संग वह खा लेना,
कल याद दिलाना, अपने मन का बनवा लेना।
प्यार भरे गुस्से से बोली, दुश्मन नहीं तुम्हारी हूँ,
अच्छा नहीं लगे घर का, बाजार से मँगवा लेना।

पनीर तुमको पसंद नहीं, बची रात की लायी हूँ,
ग़ुस्सा मत दिखलाना खाने पर, समझाने आयी हूँ।
जितना नाटक दिखलाओगे, बच्चे वह ही सीखेंगे,
मौन रहकर खाना सीखो, यह बतलाने आयी हूँ।

पत्नी होती चतुर सुजान, परिवार को बाँधे रखती,
कभी डाँट कभी प्यार से, सारे घर को बाँधे रखती।
बची हुई बासी सब्ज़ी से, नये व्यंजन गढ़ने वाली,
सारे कष्ट उठाती खुद पर, परिवार को बाँधे रखती।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन

मुज़फ़्फ़रनगर 

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