निश्छल हृदय की पीर, बहुत गहन होती है,
साफ़ स्पष्ट सत्य बातें, कहाँ सहन होती हैं?
सबकी खातिर जीता- मरता, प्यार बाँटता,
पागलपन की उपमाएँ, उसे वहन होती हैं।
सर्वस्व लुटाकर, घनी धूप में छाया बनता हूँ,
परहित में निज सुख तज, अड जाया करता हूँ।
शीत लहरों से जीवन की, शीतल धूप बनकर,
विष समाज का पी, शंकर बन जाया करता हूँ।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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