कविता मन के भावों का प्रदर्शन करती है,
पर्वत के झरने से, झर झर झरा करती है।
उछल कूद करती, मचल मचल चलती,
राहगीरों की प्यास बुझाया करती है।
जाति धर्म और क्षेत्रवाद के कारा तोड,
गाँव नगर और शहरों से गुजरा करती है।
खेतों और खलिहानों को भी नीर बाँटती,
पशु पक्षियों मानव की प्रिय रहा करती है।
पर्वत से सागर तक बहने का संकल्प किया,
कष्टों को हरने का प्रयास किया करती है।
नहीं भेद करती कभी, अर्पण और तर्पण में,
अन्त समय में मोक्ष दायिनी बना करती है।
कभी उछलती पगडंडियों पर, अल्हड़ यौवना,
कभी लहर सम मचलती, तट आया करती है।
ऋषि मुनियों की गहन साधना, कविता उसमें,
मंत्रों का रचती, जीवन सार सुनाया करती है।
मत बाँधो कविता को, परिभाषाओं के बंधन में,
कविता रंग कूँची मूर्ति पत्थर, शब्दों में बसती है।
इन्द्रधनुषी रंगों में गौरी के गालों पर सजती,
टेसू के रंग पिचकारी से गौरी के तन पर चलती है।
दीप दीवाली के घर आँगन, खेतों से खलिहानों तक,
बचपन के हाथों में फुलझड़ी सी, तम में चलती है।
हँसना जीना गाना कविता, खुश रह मुस्कुराना कविता,
मौन हृदय की पीड़ा कविता, दर्द भरा तराना बनती है।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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