Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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जीवन की आपाधापी में

 

जीवन की आपाधापी में, कुछ बातें बिसरा देते हैं,
कुछ याद रहें हमको, कुछ जानबूझ ठुकरा देते हैं।
है अजब उलझन हमको, किसको भूलें- याद करें,
अपने तो ज़ख़्म देते अक्सर, मरहम गैर लगा देते हैं।

कुंठित मन लेकर, कब आगे कौन बढ़ा है,
खुद ही व्याकुल व्यथित मन, मौन खड़ा है।
उलझा है उलझन में, कैसे तुमसे जीत सकूँ,
दुविधा में निज ख़ुशियाँ, सुख गौण खड़ा है।

चल रहा जो सादगी से, नुक़सान कहाँ होता है,
सकारात्मक सोचिये, मन को आराम होता है।
छली कपटी चालाक, उलझनों में उलझा रहा,
जिसको कर्म पर भरोसा, परेशान कहाँ होता है?

कभी-कभी यूँ ही खिलखिलाना चाहिये,
चाहे जितने भी गम हों, भूल जाना चाहिये।
जीवन की राहें हैं सदा, बहुत उलझी हुयी,
उलझनों से निपटना, सिरा पकड़ना चाहिये।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन

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