Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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ज़िम्मेदारियों के बोझ तले

 

ज़िम्मेदारियों के बोझ तले, ज़िन्दगी जी न सका,
खुद की ख़ातिर कब जिया, लेखा मिल न सका।
आज थोड़ा सा मुस्कुराये, सोच कर बातें पुरानी,
हमारी ख़ुशी से तुम्हारा चेहरा, जरा खिल न सका।

बात थी उस इश्क़ की, जो बिन इश्क़ मर गया,
उम्र भर का दर्द था, हमने सुनाया वह डर गया?
भगवान भक्ति की बातें, बूढ़ों को करनी चाहिएँ?
उम्र को जी भर जीने की चाह, बुढ़ापा कर गया।

उम्र को मोहब्बत से, मत जोड कर देखिए,
हिना सा सूख कर गहरा, सोच कर देखिए।
इश्क कब किसी के रोके रूका, जहान में,
बुढ़ापे में जवां होता, जवानी में कर देखिए।

इश्क़ परिवार से हो या प्रभु से कर देखिए,
इश्क़ पत्नी या पति से, प्रेमी से कर देखिए।
इश्क़ राधा से करो या कान्हा से करते रहो,
इश्क़ का मतलब समर्पण, इश्क़ कर देखिए।

बैठकर दरिया किनारे, बस लहरें गिनते रहो,
तैरने की चाह नही, डूबने का डर डरते रहो।
उतरोगे जो बीच धार, तो ही पार उतर पाओगे,
जीना तो सीख न सके, मरने से भी डरते रहो।

क्यों कोई ख़ुश रहे, टीस कुछ को सालती,
ध्यान भक्ति में नही, कमियों को खंगालती।
मन भटकता मृगतृष्णा, चहूँ और निहारता,
ग़ैरों की ख़ुशियाँ अधिक हैं, कुंठाएँ पालती।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन

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