Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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जब रातों में नींद न आये

 

जब रातों में नींद न आये, ख्वाब दूर खुद से हो जाये,
करवट बदलें बिस्तर पर, सूनापन मन में छा जाये।
तलाश बढे मन के भीतर, क्या खोया तलाश रहे जो,
जोड़ रहे हैं तार पुराने, शायद रिश्ता क़ायम हो जाये।

नहीं जुड़ा जब रिश्ता कोई, भूली बिसरी यादों से,
सुख दुख का किस्सा कोई, याद न आया यादों से।
उठ कर बैठे बिस्तर पर, मोबाईल को खोल लिया,
बस देखते रहे व्यर्थ ही, कुछ लिख न पाये यादों से।

विचार मचलते लहरों जैसे, वो तट पर टिक पाये ना,
लहरें आती यादें लेकर, यादें तट पर टिक पाये ना।
कभी- कभी मन के आँगन, यादें सोन चिरैया जैसी,
खूब फुदकती गीत सुनाती, मन आँगन टिक पाये ना।

कोरा कागज कलम हाथ में, विचारों का मंथन जारी,
आज लिखेंगे सफ़र याद का, शब्द संयोजन तैयारी।
मन के अन्दर मचल रहे थे, उतर सके न कागज पर,
भावों की वैतरणी सम्मुख, बीच भँवर डूब डर भारी।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन

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