हो गयी कटी पतंग सी जिन्दगी,
है नहीं कुछ भी नियंत्रण जिन्दगी।
हर हवा के झोंके से हिचकोले हैं,
वक्त के थपेड़े सह रही है जिन्दगी।
जब तलक थी डोर हाथ, इसको नचाता रहा,
ढील देकर नील गगन तक, खुद इठलाता रहा।
लहराता रहा जिन्दगी को नित नये अन्दाज़ में,
ढील पैंच का खेल खेला, जिन्दगी लड़वाता रहा।
था बहुत ख़ुश, काट कर ग़ैरों की डोर,
सोचा नहीं था कट सकेगी अपनी डोर।
डोलती अपनी पतंग इस गली उस गली,
समेटने को बची जिन्दगी की बाकी डोर।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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