हमने जीना सीख लिया है—
खुद पर हँसना सीख लिया है,
हाँ, हमने जीना सीख लिया है।
रोने से क्या हासिल होता,
हमने गम में सीख लिया है।
हर ग़म की चाबी ख़ुशियों में,
जीवन का सुख ख़ुशियों में।
गम को जीवन लेखा समझा,
हमने लिखना सीख लिया है।
यह मत करना वह मत करना,
ऐसे रोना वैसे हँसना,
बदल दिये रहने के रंग ढंग,
हमने जीना सीख लिया है।
बीस बरस से बदल रही हो,
अब कहती हो बदल गये हैं।
भूल गये हैं सजना जँचना,
हमने हँसना सीख लिया है।
क्या अपना था, खो जायेगा,
क्या संग में लेकर जायेगा?
दया धर्म मानवता जीवन में,
हमने मरना सीख लिया है।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
मुज़फ़्फ़रनगर
8265821800
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