घर में चारों धाम पता तब चल पाया,
दुनिया के सब ठौर भटक, घर आया।
खाये छप्पन भोग, रहा होटल में जाकर,
बच्चों के संग रूखी रोटी में सुख पाया।
मख़मल के गद्दों पर सोया, नींद न आयी,
थक कर चूर हुआ तो, माँ की गोद सुहायी।
दर्द बहुत था, जग की पीड़ाओं का मन में,
शुकूं मिला जब रूखी रोटी बाँट कर खायी।
तन्हाई में रहकर देखा, जीवन कैसा लगता है,
मात पिता संग रहकर देखा, अच्छा लगता है।
बीत रहा था तन्हा जीवन, घुटन और तन्हाई में,
बच्चों संग जीवन का हर पल, सच्चा लगता है।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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