Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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गर्मी

 

गर्मी


आग बरसती अम्बर से, सूरज पर दोष लगाते हो,
वृक्ष विहीन धरा करी, दोष समझ नहीं पाते हो।
कंक्रीट के लगाकर जंगल, धरती पर बोझ बढाया,
गलती खुद की देख सके ना, अनजान बन जाते हो।

बन्द करे सब ताल तलैया, नदियों में कचरे का ढेर,
कल कारख़ाने चहूँ ओर, सूरज पर आरोप लगाते हो।
निज स्वार्थ में अस्त शस्त्र, हथियारों का निर्माण किया,
मानवता का कत्ल कर, प्रकृति को आरोपी ठहराते हो।

वेदों ने आह्वान किया था, प्रकृति को भगवान कहा था,
प्रदूषित हवा जल नभ धरा, सूरज के माथे मँढ जाते हो।
बचे नही वन जंगल उपवन, पर्वत के तन दरक रहे हैं,
नंगी धरती- नंगे पर्वत, क्यों मुझ पर आरोप लगाते हो।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन 
मुज़फ़्फ़रनगर

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