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Dr. Srimati Tara Singh
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भारतीय नववर्ष विक्रम संवत का आज से प्रारम्भ

 
भारतीय नववर्ष विक्रम संवत का आज से प्रारम्भ

बदलेगा नव वर्ष नया संवत आयेगा,
कुदरत में भी रंग नया दिख जायेगा।
चहकें चिड़िया और परिन्दे नीलगगन,
कली- कली पर भौरा रास रचायेगा।
झूमेगी सरसों खेतों में धानी चूनर ओढ़े,
अंकुरित नव पात, पीत पत्र झर जायेगा।
कोयल कुकेगी बागों में, आम वृक्ष बैठी,
शीतल मन्द पवन का झौंका मन हर्षायेगा।

भारतीय नववर्ष विक्रम संवत से प्रारम्भ होता है| जो कि वर्तमान वर्ष से 57 वर्ष पूर्व से गिना जाता है|। इस समय 2026+ 57= 2083 का आगाज हो रहा है।
नये संवत का आगाज चैत्र मास यानि लगभग मार्च मे होता है | जब मौसम बदलता है, नयी फसले आती हैं। सर्दी का अन्त होता है। कन्या पूजन नवरात्रो का आयोजन किया जाता है। जब भू गगन वायु अग्नि नीर यानि सम्पूर्ण प्रकृति उत्साह से भर नाच उठती है। वृक्षो से पीत पत्र झर जते हैं, नयी कोपले फूटती हैं, तब होता है नव वर्ष।
आप सबकी खुश मे शामिल हों अच्छा है मगर क्या कभी अपना नववर्ष मनाया? वह नववर्ष जिसका आधार वैज्ञानिक है, प्रकृति से जुडा है। इस बार भारतीय नववर्ष भी इतने ही उत्साह से मनाये। पूजा पाठ, धर्म कर्म और हवन करें। हमारे नववर्ष पर शराब और मांस का प्रयोग नही होता है। निर्दोषों बेजुबानो को स्वाद के लिये मारा नही जाता है। हमारा नववर्ष मानवता को समर्पित है। दीन दुखी की सेवा करना ही मानवता है, यही सनातन है, यही हिन्दू धर्म है।

भारतीय नववर्ष का, प्रकृति ही आधार है,
सृष्टि के प्रारम्भ से ही इसका विस्तार है।
ब्रह्मा ने सृष्टि रची, प्रारम्भ चैत्र मास था,
फ़सलों का पकना, समृद्धि का सार है।

बदल गया मौसम, नववर्ष आया है,
प्रकृति ने रंग रूप, नया सजाया है।
फूल रही सरसों, खेत में धानी धानी,
प्रफुल्लित किसान, देखकर हर्षाया है।

तितली भौरें झूम रहे हैं, कली फूल पर,
कोयल कूकी आम, नया संवत आया है।
चली गई सर्दी, मौसम ने अंगड़ाई ले ली,
कोट रज़ाई त्यागे, जन जन इठलाया है।

नवयौवना चहक रही, सजा रही घर द्वारे,
चलो मनायें उत्सव, नववर्ष आया है।
घर घर दीप जलें, हो धन धान्य की वर्षा,
करें सम्मान प्रकृति का, नववर्ष आया है।

काल खंड को मापने के लिए जिस यन्त्र का उपयोग किया जाता है उसे काल निर्णय, काल निर्देशिका या कलेंडर कहते हैं। दुनिया का सबसे पुराना कलेंडर भारतीय है। इसे सृष्टि संवत कहते हैं, इसी दिन को सृष्टि का प्रथम दिवस माना जाता है। यह संवत 1972949126 यानी एक अरब, सत्तानवे करोड़, उनतीस लाख, उनचास हज़ार,एक सौ छब्बीस वर्ष (मार्च 20256 विक्रम संवत 2083 के आरम्भ तक) पुराना है। हमारे ऋषि- मुनियों तथा खगोल शास्त्रियों ने 360 डिग्री के पुरे ब्रह्माण्ड को 27 बराबर हिस्सों में बाँटा तथा इन्हें नक्षत्र नाम दिया। इनके नाम क्रमश निम्न हैं....
अश्विनी, भरिणी, कृतिका, रोहिणी, म्रगसिरा, आद्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, माघ, पुफा, उफा, हस्ती, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, गूला, पूषा, उषा, श्रवण, घनिष्टा, शतवार, पु-भा, उमा तथा रेवती रखे गए। इनमे से बारह नक्षत्रों में चंद्रमा की स्थिति के आधार पर महीनो के नाम रखे गए हैं। एक, तीन, पाँच, आठ, दस, बारह, चौदह, अठारह, बीस, बाईस व पच्चीसवें नक्षत्र के आधार पर भारतीय महीनों के नाम .....
चैत्र, बैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, सावन, भादों, आश्विन, कार्तिक, मगहर , पूस , माघ व फागुन रखे गए।
प्रश्न यह है कि भारतीय नव वर्ष का प्रारंभ चैत्र मास से ही क्यों? वृहद नारदीय पुराण में वर्णन है कि ब्रह्मा जी ने स्रष्टि सृजन का कार्य चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही प्रारम्भ किया था। वहाँ लिखा है....

"चैत्र मासि जगत, ब्रहम्ससर्जाप्रथमेअइति"

इसीलिए ही भारतीय नववर्ष का प्रारंभ आद्यशक्ति भगवती माँ दुर्गा की पूजा उपासना के साथ चैत्र मास से शुरू करते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ऩे सूर्य के महत्त्व, उपयोगिता को समझते हुए रविवार को ही सप्ताह का पहला दिन माना। उन्होंने यह भी आविष्कार किया कि सूर्य, शुक्र, बुधश्च, चन्द्र, शनि, गुरु, मंगल नामक सात ग्रह हैं। जो निरंतर पृथ्वी की परिक्रमा करते रहते हैं।और निश्चित अवधि पर सात दिन मे प्रत्येक ग्रह एक निश्चित स्थान पर आता है। इन ग्रहों के आधार पर ही सात दिनों के नाम रखे गए। सात दिनों के अन्तराल को सप्ताह कहा गया। इसमें रात दिन दोनों शामिल हैं।
ज्योतिषगणित की भाषा मे दिन-रात को अहोरात कहते हैं। यह चौबीस घंटे का होता है। एक घंटे का एक होरा होता है। इसी होरा शब्द से अंग्रेजी का hour शब्द बना है। प्रत्येक होरा का स्वामी कोई ग्रह होता है। सूर्योदय के समय जिस ग्रह की प्रथम होरा होती है उसी के आधार पर उस दिन का नाम रखा गया है। इस प्रकार सोमवार, मंगलवार, बुधवार, ब्रहस्पतिवार, शुक्रवार शनिवार तथा अंतिम दिन रविवार पर ख़त्म होता है।
भारतीय ऋषि-मुनियों ऩे काल गणना का सूक्ष्मतम तक अध्यन किया। इसके अनुसार दिन रात के 24 घंटों को सात भागों मे बाँटा गया और एक भाग का नाम रखा गया घटी'। इस प्रकार एक घटी हुई 24 मिनट के बराबर और एक घंटे मे हुई ढाई घटी। इससे आगे बढ़ें तो
एक घटी मे 60 पल,
एक पल मे 60 विपल,
एक विपल मे 60 प्रतिपल
4 घंटे= 60 घटी
एक घटी= 60 पल
एक पल= 60 विपल
एक विपल= 60 प्रतिपल

अगर हम काल गणना की बड़ी इकाई देखें तो ....
24 घंटे = 1 दिन
30 दिन = 1 माह
12 माह = 1 वर्ष
10 वर्ष = 1 दशक
10 दशक = एक शतक
कलयुग= चार लाख बत्तीस हज़ार (432000 वर्ष)
द्वापरयुग =आठ लाख चौसंठ हज़ार वर्ष (864000 वर्ष)
त्रेतायुग =बारह लाख छियानवे हज़ार वर्ष (1296000 वर्ष) सतयुग =सत्रह लाख अट्ठाईस हज़ार वर्ष (1728000 वर्ष)
एक महायुग =चारों युगों का योग =4320000वर्ष
1000 महायुग =एक कल्प
एक कल्प को ब्रह्मा जी का एक दिन या एक रात मानते हैं।
अर्थात ब्रह्मा जी का एक दिन व एक रात 2000 महायुग के बराबर हुआ। हमारे शास्त्रों मे ब्रह्मा जी की आयु 100 वर्ष मानी गई है। इस प्रकार ब्रह्मा जी कि आयु हमारे वर्ष के अनुसार 51 नील,10 ख़रब 40अरब वर्ष होगी। अभी तक ब्रह्मा जी की आयु के 58वर्ष एक माह, एक पक्ष के पहले दिन की कुछ घटिकाएं व पल व्यतीत हो चुके हैं। समय की इकाई का एक अन्य वर्णन भी हमारे शास्त्रों मे पाया जाता है...
1 निमेष = पलक झपकने का समय
25 निमेष =1 काष्ठा
30 काष्ठा = 1 कला
30 कला = 1 मुहूर्त
30 मुहूर्त =1 अहोरात्र (रात-दिन मिलाकर)
15 दिन व रात = एक पक्ष या एक पखवाडा
2 पक्ष = 1 माह (कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष)
6 माह = 1 अयन
2 अयन = 1 वर्ष (दक्षिणायन व उत्तरायण)
43लाख 20हज़ार वर्ष = 1 पर्याय (कलयुग,द्वापर,त्रेता व सतयुग का जोड़)
71पर्याय = 1 मन्वंतर
14 मन्वंतर = 1कल्प

वर्तमान भारतीय गणना के अनुसार वर्ष मे 365 दिन, 15 घटी, 22पल व 53.85072 विपल होते हैं। तथा चन्द्र गणना के अनुसार भारतीय महीना 29 दिन, 12घंटे, 44मिनट व 27 सेकंड का होता है। सौर गणना के अंतर को पाटने के लिए अधिक तिथि और अधिक मास तथा विशेष स्थिति मे क्षय की भी व्यस्था की गई है। उपरोक्त गणनाओं के अनुसार अभी स्रष्टि के ख़त्म होने मे 4लाख, 26हज़ार, 852वर्ष कुछ महीने, कुछ सप्ताह, कुछ दिन, बाकी हैं।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रम संवत 2083 भारतीय सनातनी नववर्ष का शुभ दिवस है। हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई।
आज अपने घरों को दीपों से सजायें,
विक्रम संवत नववर्ष दीपावली मनायें।
न रहने पाये अँधेरा कहीं भारत धरा पर,
रोशनी के पुंजों से निज घरों को सजायें।
सुबह से हो पूजा हवन कीर्तन घरों में,
मन्दिरों में घंटी करताल शंखनाद करायें।
भूखा न सोये कोई पशु पक्षी मानव,
सनातन का परचम जगत में फहरायें।

डॉ अ कीर्तिवर्धन
53 महालक्ष्मी एनक्लेव
मुजफ्फरनगर

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