बेटा या बेटी—-
कौन सहारा माँ बाप का, बेटा या बेटी होती,
पूछ रहे बाबा दोनों से, बात क्या सच्ची होती?
बेटा वंश चलाता आगे, हरदम साथ निभाता,
बुढ़ापे की लाठी बन रहता, वही सहारा बनता।
मूल से प्यारा सूद बताते, ज्ञानी जन समझाते,
दादा दादी बच्चों संग ही, निज बचपन जी पाते।
बेटी भी तो मात पिता से, अपार स्नेह रखती है,
उसकी ज़िम्मेदारी पति, सास ससुर संग बढती है।
समाज ने कुछ नियम बनाये, निर्धारण किया दायित्वों का,
बेटा मात पिता की सेवा, बेटी ससुराल पक्ष दायित्वों का।
बेटा बेटी दिल के टुकड़े, दोनों होते एक समान,
कर्तव्य दोनों के जुदा जुदा, करना दायित्वों का निर्वहन।
एक सिक्के के दो पहलू, दोनों लगते एक समान,
दोनों से घर की पहचान, परिवार का बढ़ता मान।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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