बेटी भी तो चिड़िया होती, बाबुल के आँगन की,
संस्कारों से शान बढ़ाती, बाबुल के आँगन की।
कभी दौड़ती इस कमरे में, कब आँगन में आती,
बेटी ही ख़ुशियाँ होती है, बाबुल के आँगन की।
कभी बहन बनकर वह, भाई से लाड़ लड़ाती,
कभी वह बेटी बनकर, अपना अधिकार जताती।
कभी-कभी अपनों खातिर, लड़ने को अड जाती,
छोटी है पर कभी पिता को, खाने पर डाँट लगाती।
खेल खेलती बचपन से वह, गुड्डे गुड़िया वाले,
कभी सजाती गुड्डे को, गुड़िया के वस्त्र निराले।
झूठ मूठ का चूल्हा उसका, झूठ मूठ की रोटी,
हर्षित होते सभी देखकर, उसके खेल निराले।
चिडिया सी बेटी के पंखों को, नई उड़ान मिलेगी,
कोमल से उसके ख़्वाबों को, ऊँची उड़ान मिलेगी।
संस्कार संस्कृति की संरक्षक, संवाहक संवर्धक,
साहस और शौर्य से उसको, ऊँची उड़ान मिलेगी।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY