अनसुलझे प्रश्न
जाने कितनी पीर थी भीतर, कितने प्रश्न अनसुलझे थे,
व्याकुल व्यथित विचलित मन, सभी प्रश्न अनसुलझे थे।
जितना भी सुलझाना चाहा, उलझन से ज्यादा उलझ गये,
सकारात्मक चिंतन से, सुलझ गये सब जो अनसुलझे थे।
रिश्तों में टकराहट बढ़ती, पीड़ाएँ खुद को ही डसती,
ग़ैरों की ख़ुशियों से पीड़ित, निज मन को व्यथित करती।
सम्मुख खड़ा प्रश्न अनसुलझा, नहीं कोई उत्तर मिलता,
उपलब्धि किसी ग़ैर की, क्यों मन को आहत करती?
ढूँढ रहा हूँ कस्तुरी को, व्याकुल होकर यहाँ वहाँ,
जिसकी खुश्बू से व्याकुल, मुझे मिलेगी वह कहाँ?
व्याकुल व्यथित विचलित मन, सभी प्रश्न अनसुलझे थे।
जितना भी सुलझाना चाहा, उलझन से ज्यादा उलझ गये,
सकारात्मक चिंतन से, सुलझ गये सब जो अनसुलझे थे।
रिश्तों में टकराहट बढ़ती, पीड़ाएँ खुद को ही डसती,
ग़ैरों की ख़ुशियों से पीड़ित, निज मन को व्यथित करती।
सम्मुख खड़ा प्रश्न अनसुलझा, नहीं कोई उत्तर मिलता,
उपलब्धि किसी ग़ैर की, क्यों मन को आहत करती?
ढूँढ रहा हूँ कस्तुरी को, व्याकुल होकर यहाँ वहाँ,
जिसकी खुश्बू से व्याकुल, मुझे मिलेगी वह कहाँ?
छिपी हुई घट भीतर, नहीं जिसका खुद को ज्ञान जरा,
मृग मरिचिका में जल पाने, भटक रहा है जहाँ तहाँ।
मृग मरिचिका में जल पाने, भटक रहा है जहाँ तहाँ।
समस्याएं तो सबके सम्मुख, सुरसा मुख सी खड़ी हुई,
एक सुलझती चार उलझती, उलझन बन कर खड़ी हुई।
अनसुलझी सुलझाने बैठे, सुलझी को बिसरा बैठे,
नहीं लिया आनन्द ख़ुशियों का, अपने सम्मुख खड़ी हुई।
अनसुलझे प्रश्नों के बीच, कुछ सुलझा सा देखा है,एक सुलझती चार उलझती, उलझन बन कर खड़ी हुई।
अनसुलझी सुलझाने बैठे, सुलझी को बिसरा बैठे,
नहीं लिया आनन्द ख़ुशियों का, अपने सम्मुख खड़ी हुई।
सकारात्मक जिसमें सोचा, सब सुलझा सा देखा है।
नहीं सताती पीर कोई, जो मानवता हित सोचा करता,
अनसुलझे प्रश्नों का उत्तर, निज मन के अंदर देखा है।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
मुज़फ़्फ़रनगर
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