जब भी चाहता हूँ कविता लिखना, भाव नहीं आते हैं,
उथल- पुथल होती है मन में, ठहराव नहीं आते हैं।
भावों को यदि बाँध ना पाये, कलम- कागज़ की कैद में,
समन्दर में लहर के मानिन्द, वो ठहर नहीं पाते हैं।साफ़ सफाई जीवन का, बना रहे अभियान,
लक्ष्मी भी विराजें वहीँ, जहां स्वच्छ मुकाम।
बिमारियाँ आती नहीं, उस बस्ती की ओर,
मानव जहां कर रहे, स्वच्छता पर अभिमान।
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