जब मन तडफे व्याकुल होऊँ, कोई मुझे पैगाम दे,
चिट्ठी लिखकर मेरे नाम की, धीरज का पैगाम दे।
आकुल व्याकुल घायल मन, कैसे इसको धीर मिले,
घायल मन शीतलता पा जाये, शब्दों से पैगाम दे।
नहीं चाहिए कोई ऐसा, बस जख्मों को जाये कुरेद,
विचलित होते व्याकुल मन को, ममता का पैगाम दे।
ज़ख्म घने हैं आह न निकले, अपनों की रूसवाई के,
तन्हाई में जब बहते आँसू, कोई स्नेह भरा पैगाम दे।
व्यथित हो जब नयन तलाशें, कोई अपना मिल जाये,
पीड़ा कह मन हल्का हो जाये, दोस्त कोई पैगाम दे।
अ कीर्ति वर्द्धन
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