भारत छोड़ो आंदोलन: स्वतंत्रता संघर्ष की अंतिम बड़ी जनक्रांति और कुछ रोचक पहलू
भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह निर्णायक अध्याय था, जिसने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष को एक नए और अंतिम बड़े चरण में पहुंचा दिया। आम तौर पर इसे महात्मा गांधी के “करो या मरो” के आह्वान और 9 अगस्त 1942 की गिरफ्तारियों के साथ याद किया जाता है, लेकिन इसकी कहानी इससे कहीं अधिक व्यापक और रोचक है। यह केवल कांग्रेस द्वारा चलाया गया कोई सामान्य राजनीतिक आंदोलन नहीं था। जब इसके बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, तब विद्यार्थियों, किसानों, श्रमिकों, महिलाओं और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में आंदोलन को आगे बढ़ाया। कई जगह भूमिगत गतिविधियां शुरू हुईं और कुछ क्षेत्रों में लोगों ने समानांतर प्रशासन चलाने का भी प्रयास किया। इस दृष्टि से भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय जनता की राजनीतिक चेतना, स्वतंत्रता की इच्छा और ब्रिटिश शासन को चुनौती देने की एक बड़ी अभिव्यक्ति था।
भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि द्वितीय विश्वयुद्ध से जुड़ी थी। 1939 में ब्रिटेन ने भारतीय नेताओं से सलाह लिए बिना भारत को भी युद्ध में शामिल घोषित कर दिया। कांग्रेस ने इसका विरोध किया। उसका कहना था कि भारत को अपने भविष्य के बारे में स्वयं निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए। युद्ध के आगे बढ़ने के साथ भारत की राजनीतिक स्थिति और कठिन होती गई। 1942 में ब्रिटिश सरकार ने क्रिप्स मिशन को भारत भेजा। इसका उद्देश्य भारतीय नेताओं के साथ संवैधानिक व्यवस्था को लेकर समझौता करना था, लेकिन कांग्रेस और अन्य भारतीय राजनीतिक शक्तियों के साथ कोई सहमति नहीं बन सकी। इसके बाद कांग्रेस के भीतर यह विचार मजबूत हुआ कि भारत से ब्रिटिश शासन का तत्काल अंत होना चाहिए।
14 जुलाई 1942 को कांग्रेस कार्यसमिति ने एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया। इसमें ब्रिटिश शासन को समाप्त करने और भारत को स्वतंत्र करने की मांग की गई। इस प्रस्ताव में भारत की स्वतंत्रता को केवल भारत का प्रश्न नहीं माना गया, बल्कि दुनिया में स्वतंत्रता और फासीवाद तथा नाज़ीवाद के खिलाफ चल रहे संघर्ष से भी जोड़ा गया। कांग्रेस का विचार था कि एक स्वतंत्र भारत ही विश्व में स्वतंत्रता और शांति के व्यापक प्रयासों में प्रभावी भूमिका निभा सकता है।
भारत छोड़ो आंदोलन का उद्देश्य केवल अंग्रेजों को भारत से बाहर भेजना नहीं था। कांग्रेस के दस्तावेजों में लोकप्रिय भारतीय प्रतिनिधियों को सत्ता सौंपने की बात भी कही गई थी। 5 अगस्त 1942 के प्रस्ताव के मसौदे में ब्रिटिश शासन को तत्काल समाप्त करना भारत और मित्र राष्ट्रों के युद्ध-प्रयासों के लिए आवश्यक बताया गया था। इसका अर्थ यह था कि भारत की स्वतंत्रता केवल भारतीय जनता के हित में ही नहीं, बल्कि दुनिया में स्वतंत्रता और शांति के व्यापक उद्देश्य के लिए भी जरूरी मानी जा रही थी।
8 अगस्त 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में भारत छोड़ो प्रस्ताव को अंतिम रूप से स्वीकार किया गया। बैठक ग्वालिया टैंक मैदान में हुई, जिसे बाद में अगस्त क्रांति मैदान कहा गया। इसी अवसर पर महात्मा गांधी ने प्रसिद्ध “करो या मरो” का आह्वान किया। “Quit India” और “करो या मरो” को अक्सर एक ही व्यक्ति से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन दोनों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अलग थी। “Quit India” नारे को लोकप्रिय बनाने में कांग्रेस के समाजवादी नेता यूसुफ मेहरअली की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उन्होंने यह नारा सुझाया था, गांधी ने इसे स्वीकार किया और मेहरअली ने आंदोलन से पहले इसी नाम की पुस्तक भी प्रकाशित की। उन्होंने “Quit India” लिखे बैजों के माध्यम से भी इस नारे को लोकप्रिय बनाया।
आंदोलन का आरंभिक कार्यक्रम सत्याग्रह और जन-असहयोग की भावना पर आधारित था। भूमिगत रूप से प्रसारित एक महत्वपूर्ण दस्तावेज “ट्वेल्व-पॉइंट प्रोग्राम” था। इसमें हड़ताल करने, नमक बनाने और विद्यार्थियों से कक्षाओं का बहिष्कार करने जैसे कार्यक्रमों का उल्लेख था। उस समय ब्रिटिश सरकार ने प्रेस पर कड़ा नियंत्रण लगा रखा था। इसलिए ऐसे भूमिगत साहित्य, पर्चों और संदेशों ने आंदोलन की खबरें लोगों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गांधी के “करो या मरो” और “विजय या मृत्यु” जैसे संदेश भी ऐसे साहित्य के माध्यम से लोगों तक पहुंचे।
8 अगस्त की बैठक समाप्त होने के तुरंत बाद ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार करने की कार्रवाई शुरू कर दी। 9 अगस्त की सुबह महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद और कांग्रेस के अनेक प्रमुख नेता गिरफ्तार कर लिए गए। इस तरह आंदोलन के औपचारिक राष्ट्रीय आह्वान के तुरंत बाद उसका केंद्रीय नेतृत्व जेल में डाल दिया गया। लेकिन इससे आंदोलन खत्म नहीं हुआ। इसके विपरीत, अनेक क्षेत्रों में स्थानीय नेताओं और आम लोगों ने अपने स्तर पर आंदोलन को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया।
9 अगस्त 1942 का एक महत्वपूर्ण दृश्य बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान से जुड़ा है। शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद अरुणा आसफ अली वहां पहुंचीं और राष्ट्रीय ध्वज फहराया। पुलिस ने भीड़ को हटाने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल किया और गोलीबारी में लोगों के मारे जाने तथा घायल होने की घटनाएं हुईं। इसके बाद अरुणा आसफ अली भूमिगत आंदोलन का एक प्रमुख चेहरा बन गईं। यह घटना इस बात का प्रतीक बन गई कि नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भी जनता का आंदोलन रुकने वाला नहीं था।
भारत छोड़ो आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक उसका भूमिगत स्वरूप था। ब्रिटिश सरकार की सेंसरशिप और गिरफ्तारियों के कारण आंदोलनकारियों ने समाचार और संदेश पहुंचाने के नए तरीके अपनाए। भूमिगत समाचार-पत्र, पर्चे, बुलेटिन और गुप्त प्रसारण आंदोलन के महत्वपूर्ण साधन बने। इस दौरान यह भी स्पष्ट हुआ कि किसी बड़े राजनीतिक संघर्ष में सूचना स्वयं प्रतिरोध का एक शक्तिशाली माध्यम बन सकती है।
इस भूमिगत गतिविधि का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण उषा मेहता और उनके साथियों द्वारा चलाया गया गुप्त कांग्रेस रेडियो था। इस रेडियो के माध्यम से सरकारी सेंसरशिप से बचकर आंदोलन से जुड़ी खबरें और संदेश प्रसारित किए जाते थे। कांग्रेस रेडियो का पहला प्रसारण अगस्त 1942 के अंत में शुरू हुआ। इसका महत्व केवल समाचार पहुंचाने तक सीमित नहीं था। इसने आंदोलनकारियों और आम जनता को यह विश्वास दिलाया कि ब्रिटिश सरकार के संचार माध्यमों पर नियंत्रण के बावजूद स्वतंत्रता की आवाज को दबाया नहीं जा सकता।
भारत छोड़ो आंदोलन का एक और महत्वपूर्ण पक्ष कुछ क्षेत्रों में समानांतर सरकारों का उभरना था। ब्रिटिश प्रशासन को कई जगह गंभीर चुनौती मिली और स्थानीय आंदोलनकारियों ने वैकल्पिक प्रशासन चलाने का प्रयास किया। उत्तर प्रदेश के बलिया में चित्तू पांडे के नेतृत्व में 19 अगस्त 1942 को अल्पकालिक राष्ट्रीय सरकार स्थापित हुई। आंदोलनकारियों ने जिला प्रशासन पर नियंत्रण स्थापित किया और गिरफ्तार कांग्रेस नेताओं की रिहाई कराई। हालांकि ब्रिटिश सेना के वापस आने के बाद यह व्यवस्था बहुत जल्दी समाप्त हो गई। बलिया की घटना यह बताती है कि आंदोलनकारियों में केवल अंग्रेजी शासन का विरोध करने की इच्छा ही नहीं थी, बल्कि वे अपने स्तर पर स्थानीय शासन चलाने की क्षमता भी दिखाना चाहते थे।
बंगाल के तमलुक और कांथी क्षेत्र में तम्रलिप्त जातीय सरकार का गठन हुआ। इसका गठन 17 दिसंबर 1942 को हुआ। यह व्यवस्था अपेक्षाकृत लंबे समय तक चली और न्याय, शांति-सुरक्षा तथा गरीबों की सहायता जैसे काम करने का प्रयास किया गया। सरकारी अभिलेखों में इसके समाप्त होने को लेकर अगस्त 1944 का उल्लेख मिलता है, हालांकि कुछ विवरण इसे सितंबर 1944 तक चलने की बात भी कहते हैं। इसलिए इसकी समाप्ति की सटीक तारीख को लेकर स्रोतों में अंतर दिखाई देता है। इतना निश्चित है कि यह भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उभरी सबसे महत्वपूर्ण समानांतर प्रशासनिक व्यवस्थाओं में से एक थी।
महाराष्ट्र का सतारा भी इस संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण था। वहां क्रांतिसिंह नाना पाटील के नेतृत्व में प्रति सरकार का गठन हुआ। इसका प्रभाव सैकड़ों गांवों तक फैला। इस व्यवस्था ने बाजार, कानून-व्यवस्था और खाद्य वितरण जैसे क्षेत्रों में वैकल्पिक व्यवस्था खड़ी करने का प्रयास किया। इसके साथ तूफान सेना नामक एक सशस्त्र संगठन भी जुड़ा था। सतारा का अनुभव यह दिखाता है कि भारत छोड़ो आंदोलन पूरे देश में एक ही तरीके से नहीं चला। अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार आंदोलन के तरीके भी अलग रहे।
उड़ीसा के तालचर में भी ब्रिटिश प्रशासन को चुनौती देने का प्रयास हुआ। वहां “चासी माउलिया” और “मजदूर राज” जैसी वैकल्पिक शासन-व्यवस्था की कल्पना सामने आई। इसमें स्थानीय संस्थाओं को वयस्क मताधिकार के आधार पर बनाने की बात थी। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि इससे पता चलता है कि स्वतंत्रता आंदोलन के कुछ स्थानीय प्रयोग केवल अंग्रेजों के विरोध तक सीमित नहीं थे। उनमें यह सोच भी थी कि स्वतंत्र भारत में शासन किस प्रकार जनता के अधिक करीब हो सकता है।
भारत छोड़ो आंदोलन का सामाजिक आधार भी बहुत व्यापक था। प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के बाद विद्यार्थियों, श्रमिकों, किसानों और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने अनेक क्षेत्रों में आंदोलन को आगे बढ़ाया। हड़तालें हुईं, जुलूस निकले, सरकारी संस्थानों का बहिष्कार किया गया और कई जगह संचार व्यवस्था को बाधित किया गया। हालांकि आंदोलन के हर हिस्से में गांधीजी के अहिंसक अनुशासन का पालन नहीं हुआ। कुछ क्षेत्रों में सरकारी भवनों पर हमले हुए, रेलवे और तार व्यवस्था को नुकसान पहुंचाया गया और अन्य हिंसक घटनाएं भी हुईं। इसलिए 1942 के आंदोलन को समझते समय गांधीजी के अहिंसक दर्शन और आंदोलन के कुछ हिस्सों में हुई हिंसक कार्रवाइयों, दोनों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
महिलाओं की भूमिका भी भारत छोड़ो आंदोलन की महत्वपूर्ण विशेषता थी। अरुणा आसफ अली के अलावा अनेक महिलाओं ने भूमिगत गतिविधियों में भाग लिया, संदेश पहुंचाए, आंदोलनकारियों को आश्रय दिया और उनकी सहायता की। विद्यार्थियों ने भी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटिश दमन और प्रेस सेंसरशिप के बावजूद आंदोलन से जुड़ी खबरें देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचती रहीं। व्यापक जनभागीदारी ने इस आंदोलन को केवल कांग्रेस संगठन की गतिविधि न रहने देकर एक बड़े जनप्रतिरोध का रूप दे दिया।
भारत छोड़ो आंदोलन तत्काल भारत को स्वतंत्र नहीं करा सका। ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तारियों, कठोर दमन और सैन्य तथा प्रशासनिक शक्ति का इस्तेमाल करके आंदोलन को दबाने का प्रयास किया। हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया और कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व लंबे समय तक जेल में रहा। फिर भी इस आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व बहुत बड़ा था। इसने ब्रिटिश शासन के सामने भारतीय जनता की स्वतंत्रता की इच्छा को बहुत स्पष्ट रूप से रखा और यह दिखाया कि अब भारत में औपनिवेशिक शासन को पहले की तरह आसानी से स्वीकार नहीं किया जा सकता।
भारत को 1947 में स्वतंत्रता केवल भारत छोड़ो आंदोलन के कारण नहीं मिली। भारतीय स्वतंत्रता अनेक दशकों के संघर्ष का परिणाम थी। इसमें कांग्रेस और अन्य राजनीतिक आंदोलनों, सामाजिक जागरण, क्रांतिकारी गतिविधियों, सैनिक असंतोष, द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों सहित अनेक कारकों की भूमिका रही। युद्ध समाप्त होने के बाद ब्रिटेन की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति भी बदल गई थी। इसलिए 1942 को स्वतंत्रता का अकेला कारण मानना सही नहीं होगा। फिर भी भारत छोड़ो आंदोलन स्वतंत्रता के अंतिम चरण का एक निर्णायक जन-अध्याय था।
भारत छोड़ो आंदोलन की सबसे बड़ी विरासत शायद यही थी कि जब देश के शीर्ष नेता जेल में बंद थे, तब आम लोगों ने अपने-अपने तरीके से आंदोलन को जीवित रखा। “Quit India” का नारा, गांधी का “करो या मरो” का आह्वान, भूमिगत रेडियो और साहित्य, विद्यार्थियों और महिलाओं की भागीदारी तथा बलिया, तमलुक, सतारा और तालचर जैसे क्षेत्रों में वैकल्पिक प्रशासन के प्रयास इस व्यापक जनऊर्जा के अलग-अलग रूप थे।
इसलिए भारत छोड़ो आंदोलन को केवल 8 अगस्त 1942 के प्रस्ताव या 9 अगस्त की गिरफ्तारियों तक सीमित करके देखना उसके पूरे इतिहास को समझना नहीं होगा। इसका वास्तविक महत्व उस राजनीतिक चेतना में था, जिसने यह स्पष्ट किया कि भारत का भविष्य भारत के लोगों के हाथ में होना चाहिए। स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन का अंत नहीं था, बल्कि जनता को अपने राजनीतिक भविष्य का निर्णय करने का अधिकार मिलना भी था। 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन इसी अधिकार की सबसे बड़ी और व्यापक राष्ट्रीय पुकारों में से एक था।
डॉ. शैलेशशुक्ला | Dr. Shailesh Shukla
गृहमंत्रालय, भारतसरकारद्वारा'राजभाषागौरवपुरस्कार' सेसम्मानित | Honoured with the "Rajbhasha Gaurav Award" by the Ministry of Home Affairs, Government of India.
वैश्विकसमूहसंपादक, सृजनसंसारअंतरराष्ट्रीयपत्रिकासमूह | Global Group Editor, Srijan Sansar Group of International Journals
सलाहकारसंपादक, गौड़सन्सटाइम्स | Consulting Editor, GaurSons Times
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